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चलने का जिसका पहला हक, वही सड़क से बेदखल, रफ्तार के आगे पैदल दरकिनार

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली। सड़क पर तेज दौड़ते वाहनों के साथ पैदल चलना जान को जोखिम में डालना है लेकिन सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए अलग से कोई मुकम्मल लेन न होने या असुविधाजनक रास्ता होने के चलते वे सड़क हादसों का सबसे आसानी से शिकार बनते हैं। देशभर में 2013 के दौरान 12,536 पैदल सड़क हादसों में मारे गए। इसी तरह 4863 साइकिल सवार सड़क हादसों का शिकार बने।

30 शहरों में किए गए आईआईटी के अध्ययन (साल 2009) के मुताबिक 57 से 76 फीसदी लोग अपने आवागमन के लिए किसी भी किस्म के वाहन का इस्तेमाल नहीं करते, वे यातो पैदल चलते हैं या साइकिल पर। एक नए सर्वे के मुताबिक दिल्ली में करीब 34 फीसदी लोग पैदल आवागमन करते हैं। इसके अलावा 27 फीसदी लोग बस या मेट्रो पकड़ने के लिए पैदल ही आते-जाते हैं। जबकि शहर में केवल 20 फीसदी लोगों के पास कार है और 90 फीसदी सड़कों पर
उनका कब्जा है। दिल्ली में यूनीफाइड ट्रैफिक एंड ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग एंड इंजीनियरिंग सेंटर (यूटीपैक) ने पैदल के अनुकूल रोड डिजाइन के समग्र दिशानिर्देश तैयार किए लेकिन इनके अनिवार्य न होने के चलते वह बेअसर हैं।
वास्तव में, सड़कें आमतौर पर पैदल व साइकिल सवारों के अनुकूल ही नहीं है। सड़कों पर एक के बाद एक कतार में फ्लाईओवर हैं लेकिन पैदल चलने वालों के लिए उसकी तुलना में खास सुविधाएं नहीं हैं। राजधानी दिल्ली में आश्रम चौराहे से धौलाकुंआ तक वाहनों की तेज रफ्तार दौड़ाने के लिए अनेक सिग्नल-फ्री फ्लाईओवर हैं जबकि पैदल को सड़क पार करने के लिए केवल तीन स्थानों पर (पीजीडीएवी कॉलेज, मूलचंद और मोती बाग में) फुटओवर ब्रिज हैं। जहां सबवेज हैं, वे बेहद खराब हालत, गंदे, असुरक्षित व अंधेरे में हैं जिनका कोई भी इस्तेमाल नहीं करना चाहता। सड़कों पर पैदल चलने वालों का पहला हक है लेकिन गाड़ियां रुकती ही नहीं।
जेब्रा क्रांसिंग पर अपने लिए पेलिकन लाइट के ग्रीन होने पर भी उसे अपनी जान हथेली में लेकर सड़क पार करनी पड़ती है। आईआईटी अध्ययन के मुताबिक 2005-09 के दौरान दिल्ली में हुए सड़क हादसों में मारे गए 8503 लोगों में से 51 फीसदी पैदल थे।

नोएडा व गुड़गांव में भी हैं वही हालत
नोएडा को ग्रेटर नोएडा से जोड़ने वाले 23 किलोमीटर के हाईवे पर दोनों ओर तमाम इंस्टीट्यूशन व रिहाइशी कॉलोनियां व गांव हैं लेकिन सड़क को पार करने के लिए सुविधाएं नाकाफी व कठिनाई भरी हैं, नतीजा है कि बीते पांच साल में 51 लोगों की मौत हो चुकी है।

दिल्ली से गुड़गांव की ओर जाने वाले 28 किलोमीटर के एक्सप्रेसवे पर 11 फ्लाईओवर, ओवरब्रिज हैं और सड़क के दोनों ओर कंपनियों के दफ्तर हैं, करीब डेढ़ लाख लोग सड़क पार करते हैं, उनके लिए यहां केवल तीन फुटओवर ब्रिज हैं, एक भी जेब्रा क्रासिंग नहीं है। बीते दो साल में इस हाइवे पर सड़क हादसे में 271 लोगों की मौत हुई है जिनमें से 111 पैदल थे।
पैदल के अनुकूल नहीं है फुटओवर ब्रिज व सबवेज

एंबार्क से जुड़ी व राहगीरी की संयोजक सारिका पांडा भट्ट कहती हैं कि फुटओवर ब्रिज, सबवेज वगैरह बनाना पेडिस्ट्रियन फ्रेंडली इंफ्रास्ट्रक्चर है ही नहीं। कार जिसमें एक्सीलरेटर व ब्रेक हैं, वह तो गाड़ी नहीं रोकेगा और पैदल तीन मंजिल फुटओवर ब्रिज पर ऊपर चढ़े, फिर तीस से पचास मीटर चलकर नीचे उतरे। मरते दम तक वह कोशिश करेगा कि वह ट्रैफिक के बीच से बचते-बचाते मीडियन को जंप करके ही जाए।
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