नई दिल्ली.पर्याप्त गैस न मिलने के चलते राजधानी के बवाना पॉवर प्लांट क्षमता का 20 से 25 फीसदी तक ही बिजली उत्पादन कर पा रहा है। नवंबर 2011 से प्लांट का एक मॉडच्यूल चालू है। इसके दो गैस टरबाइन व एक स्टीम टरबाइन की क्षमता 685.5 मेगावाट है लेकिन हर रोज इस प्लांट में उत्पादन के लिए 200-220 मेगावाट का शेडच्यूल ही रखा जा रहा है। बता दें कि इस प्लांट के दूसरे मॉडच्यूल के दोनों गैस टरबाइन भी तैयार हैं और स्टीम टरबाइन भी जल्द ही उत्पादन के लिए उपलब्ध होगा।
दोनों मॉडच्यूल चालू हों तो बवाना से कुल 1371 मेगावाट बिजली का उत्पादन संभव है। लेकिन गैस के उपलब्ध न रहने के चलते दूसरे मॉडच्यूल के दोनों गैस टरबाइन का कोई इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। इस प्लांट पर दिल्ली सरकार ने करीब 4500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। प्लांट को तय वक्त के मुताबिक 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के पहले ही पूरी तरह तैयार होना चाहिए था लेकिन इसके अंतिम स्टीम टरबाइन को बनाने का काम आज भी जारी है।
ऊर्जा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, ‘प्लांट तो पूरी तरह से उत्पादन के लिए तैयार है यदि गैस उपलब्ध हो तो उसे पूरी क्षमता पर चलाया जा सकता है। लेकिन गैस न मिलने के चलते बवाना प्लांट अपनी क्षमता के मुताबिक नहीं चल पा रहा है।’ प्लांट चलाने के लिए ओएनजीसी से 1.564 एमएमएसडी और रिलायंस के केजी डी-6 फील्ड्स से 0.93 एमएमएसडी गैस की आपूर्ति होनी थी लेकिन गैस की कमी के चलते रिलायंस गैस आपूर्ति नहीं कर रहा है। अधिकारी ने बताया कि ‘एक अप्रैल के बाद से गैस के बारे में नई नीति बनी है कि उपलब्ध होने पर पहली प्राथमिकता उर्वरक संयंत्रों को दी जाएगी, तब से बवाना के लिए गैस की ज्यादा किल्लत हो गई है।’
गैस न देने पर भी सरकार नहीं लगा सकती पेनाल्टी
अधिकारी के मुताबिक गैस उपलब्ध कराने वाली कंपनियों से पॉवर प्लांट के सभी करार एकतरफा हैं। करार के मुताबिक जब वास्तविकता में जितनी गैस उपलब्ध होगी कंपनी उसी कोटे के मुताबिक आपूर्ति करेगी लेकिन गैस न होने की स्थिति में आपूर्ति न करने पर उस पर कोई पेनाल्टी लगाने का प्रावधान नहीं है। अधिकारी के मुताबिक गैस के मामले में विक्रेता आधारित बाजार है।
उलटे यदि किसी तकनीकी खामी के चलते प्लांट चलने की हालत में न हो और गैस न ली जाए तो कंपनी खरीदार पर पेनाल्टी लगा सकती है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस मुद्दे पर कहा कि ‘गैस ही नहीं है तो प्लांट कैसे चले। लेकिन मैं अगले हफ्ते पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री से इस मामले में मुलाकात गैस उपलब्ध कराने की मांग करुंगी।’ उन्होंने संकेत दिए कि सरकार करार में परिवर्तन कराने की दिशा में भी विचार कर रही है।
अभी तक सभी करार गैस उपलब्ध कराने वाली कंपनी और एक प्लांट के बीच हो रहे हैं, अब विचार किया जा रहा है कि कई प्लांट्स के संयुक्त करार किए जाएं ताकि यदि किसी प्लांट में गैस का इस्तेमाल न हो तो वह गैस दूसरे प्लांट में प्रयुक्त हो सके।
पॉवर प्लांट नहीं कर रहे क्षमता के बराबर उत्पादन
नई दिल्ली बदरपुर पॉवर प्लांट में औसतन 350-400 मेगावाट का उत्पादन हो रहा है जबकि इसकी क्षमता 705 मेगावाट है। राजघाट पॉवर प्लांट की क्षमता 135 मेगावाट है लेकिन इससे रोजाना 100 मेगावाट बिजली पैदा हो रही है। इंद्रप्रस्थ गैस टरबाइन से 82 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है जबकि यहां 270 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। प्रगति पॉवर प्लांट से 330 के स्थान पर 265 मेगावाट बिजली बनाई जा रही है।
बवाना प्लांट जहां एक ही मॉडच्यूल से 685.5 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है लेकिन केवल 200 से 250 मेगावाट के बीच ही हर रोज शेडच्यूल रखा जाता है। ओखला स्थितकचरे से बिजली उत्पादन करने वाले प्लांट की क्षमता 16 मेगावाट है, उसका भी अपनी पूरी क्षमता में इस्तेमाल नहीं होता।इस तरह राजधानी के प्लांट अपनी मांग के हिसाब से केवल एक तिहाई से एक चौथाई बिजली का उत्पादन करते हैं और शेष बिजली नॉदर्न ग्रिड से मिलती है। ऊर्जा विभाग के अधिकारी कहते हैं कि आज भी गैस आधारित बिजली कोयले आधारित प्लांट से पैदा होने वाली बिजली से महंगी है, इसलिए शेडच्यूल में गैस आधारित प्लांट पर बहुत अधिक जरूरत पड़ने पर ही लोड बढ़ाया जाता है।
सोलर पैनल के लिए की छत की पेशकश
सुखदेव विहार रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने कहा है कि उनकी कॉलोनी के हर मकान की छत सोलर पैनल लगाने के लिए उपलब्ध है। रविवार को ग्रीनपीस संस्था ने यहां ‘स्विच ऑन द सन’ मेला आयोजित किया था। ग्रीनपीस की उषा सक्सेना ने कहा कि दिल्ली में साल में 320 दिन सूरज की रोशनी रहती है, जिससे यहां सौर ऊर्जा की असीम संभावनाएं हैं।
हाल ही में ग्रीनपीस ने अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल में अव्वल व फिसड्डी राज्यों का सर्वे जारी किया था जिसमें दिल्ली फिसड्डी राज्यों में से एक है। दिल्ली अपनी 75 फीसदी बिजली कोयला आधारित प्लांट्स से लेता है, जिन पांच पॉवर प्लांट से दिल्ली को बिजली मिलती है, उन्होंने पिछले साल भयानक कोयले की कमी का सामना किया। ऐसे में अक्षय ऊर्जा विकल्पों का इस्तेमाल एक बेहतर समाधान है।
रेजिडेंट एसोसिएशन की अध्यक्ष अंशु गर्ग ने कहा कि हम सरकार से गुहार लगाएंगे प्रदूषण फैलाने वाले प्लांट के स्थान पर सरकार ग्रिड इंटरएक्टिव सोलर रूफटॉप एनर्जी को प्रोत्साहित करे। इसी दिशा में अपनी छतों की पेशकश की है।