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बिजली बचत : शीला का अपने बयान पर यू-टर्न

9 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. बिल ज्यादा आने पर आमदनी के मुताबिक बिजली इस्तेमाल करने की नसीहत वाले बयान पर सोमवार को मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सफाई दी कि उनके बयान को गलत तरीके से लिया गया। उन्होंने कहा कि उनका इशारा बिजली बचत की ओर था।

उन्होंने कहा कि हम बिजली संरक्षण की बात कर रहे हैं और ये घर से ही शुरू होती है। कुछ ही वर्षों पहले तक बिजली आपूर्ति की मांग शहर में दो हजार मेगावाट थी लेकिन आज ६ हजार मेगावाट है। भविष्य में मांग और बढ़ेगी और बचत से ही बात बनेगी।

ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक राजधानी में सन २००१ में २४.५१ लाख उपभोक्ताओं के कनेक्शन थे जो आज ४२.३६ लाख हो चुके हैं।

एक दशक पहले हर रोज ६ से १० घंटे तक की कटौती होती थी और आज २४ घंटे बिजली आती है। वितरण कंपनी बीएसईएस के प्रवक्ता के मुताबिक बीते १० वर्षों में बिजली की उत्पादन लागत में ३०० गुना की वृद्धि हुई है जो १.४ रुपए प्रति यूनिट से बढ़कर ५ रुपए प्रति यूनिट हो चुकी है जबकि इस दौरान बिजली की उपभोक्ता दरें ६५ फीसदी बढ़ी हैं।

सरकार ने हाल ही में बिजली की दशा में सुधार जानने के लिए इन्वर्टर व एसी की बिक्री का एक सर्वे कराया। इस सर्वे के मुताबिक राजधानी में एसी की बिक्री साल दर साल बढ़ती जा रही है जबकि इन्वर्टर की बिक्री में लगातार गिरावट आ रही है।

वैट विभाग से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक २००९-१० से २०११-१२ के दौरान एसी की बिक्री सालाना २,६६,३०७ से ३४५०३१ हो गई जबकि इन्वर्टर की बिक्री सालाना ३,६९,५४६ से घटकर २,६२,७०२ रह गई।

तस्वीर का दूसरा पहलू

आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल बता रहे हैं कि निजीकरण के समय सरकार ने दावा किया था कि निजीकरण से पारेषण व वितरण हानि और चोरी में कमी आएगी तो उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा।

लेकिन बीते एक दशक में चोरी व हानि ५५ फीसदी से घटकर १५ फीसदी रह गई है लेकिन उपभोक्ताओं को उसका फायदा क्यों नहीं मिला।

वितरण कंपनियां बताती है कि १० फीसदी कनेक्शन से उन्हें कोई राजस्व नहीं मिलता लेकिन २००९-१० के दौरान दिल्ली जल बोर्ड ने वितरण कंपनी को ३६० करोड़ रुपए का बिल अदा किया पर कंपनी ने अपने खाते में यह भुगतान दिखाए ही नहीं।

केजरीवाल का आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर दावा है कि वितरण कंपनियां सालाना ४००० करोड़ यूनिट हर साल खरीदती हैं लेकिन दिल्ली में उसमें से केवल २६०० करोड़ यूनिट का ही इस्तेमाल होता है और सरप्लस १४०० करोड़ यूनिट बिजली ज्यादा कीमत पर बेच दी जाती है।

उनका कहना है कि कंपनियां बिजली उत्पादन की लागत को बढ़ाचढ़ाकर बताती हैं और अपने खातों में घाटा दिखाती हैं। यदि इसमें वास्तविक कीमत रखी जाए तो बिजली की दरें अपने आप कम हो जाएगी।