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क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों में फिर बढ़ा दलालों का वर्चस्व

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. राजधानी के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों में एक बार फिर दलालों का वर्चस्व बढ़ गया है। अधिकांश कार्यालयों में दिनभर लर्निंग लाइसेंस लेने के लिए अभ्यर्थियों की लंबी कतारें नजर आती हैं और उनके लाइसेंस कथित एजेंटों के जरिए ही बन रहे हैं। जानकारों का कहना है कि दरअसल विभाग द्वारा परिवर्तित नियमों के चलते यह समस्या बढ़ती जा रही है।
परिवहन विभाग ने साल 2007 से पीपीपी मॉडल के आधार पर कुछ चुनिंदा एजेंसियों को अभ्यर्थियों का टेस्ट लेने का जिम्मा सौंपा था। यह पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन थी, इसकी सीसीटीवी कैमरे के सामने रिकॉर्डिंग की जाती थी और हर आवेदक अपने टेस्ट का नतीजा देख सकता था। इसके आधार पर आवेदकों को किसी भी क्षेत्रीय कार्यालय से लाइसेंस जारी हो जाता था। पिछले साल विभाग ने आदेश जारी किया कि निजी एजेंसियों से लाइसेंस के लिए सिफारिश किए गए आवेदकों में से 20 फीसदी के टेस्ट लेने की बाध्यता कर दी। आदेश के बाद विभाग ने अपने आदेश में संशोधन कर 100 प्रतिशत लोगों के लिए शर्त रख दी कि क्षेत्रीय कार्यालयों में टेस्ट लिए बगैर किसी को लाइसेंस जारी नहीं होगा।
पीपीपी मॉडल के तहत लर्निंग टेस्ट लेने वाली ऐसी ही एक संस्था ड्राइविंग स्किल इंडिया एंड रिसर्च के अध्यक्ष पवन कुमार का कहना है कि जब उनकी जैसी संस्थाओं से आवेदकों के टेस्ट लिए जा रहे थे तो दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हो गया था।

वर्ष 2007 में पीपीपी के तहत ड्राइविंग प्रशिक्षण केंद्रों से प्रशिक्षण व टेस्ट लेने के बाद क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों को बिना लर्निंग टेस्ट लिए आवेदक को लर्निंग लाइसेंस जारी करने की व्यवस्था शुरू की गई थी। अगस्त 2010 में विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में भी परिवहन विभाग ने जवाब दिया कि पीपीटी योजना के तहत खोले गए केंद्रों पर लर्निंग टेस्ट देने वालों का क्षेत्रीय जोनल परिवहन कार्यालय के अधिकारी लर्निंग टेस्ट नहीं ले सकते।