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विज्ञापन माफिया साइट बदल एसएमसीडी को लगा रहे करोड़ों का चूना

9 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. यूनीपोल, होर्डिंग्स और पार्किंगों में विज्ञापनों की साइट बदलकर साउथ एमसीडी को करोड़ों को चूना लगाने का खेल बदस्तूर 2007 से जारी है।

पहली बार विज्ञापन विभाग के अधिकारियों ने यह लिखित में कहा है कि साउथ एमसीडी में ठेकेदार कम कीमतों में विज्ञापन का ठेका लेकर विज्ञापन का साइट बदलकर ऊंची कीमत वाली साइट पर विज्ञापन प्रदर्शित कर पिछले एक साल में 20 करोड़ से भी अधिक का चूना लगा चुके हैं। स्थाई समिति ने अधिकारियों को इस मामले की जांच के आदेश भी दिए थे।

नेता विपक्ष फरहाद सूरी ने विशेष बातचीत में बताया कि इस मामले में केवल आरपी सेल का उपायुक्त ही नहीं बल्कि एक पुराने भाजपा नेता भी शामिल हंै जो सालों से नेता सदन के पद पर ही टिके हैं।

इस नेता के आदेश के बिना एमसीडी में कोई भी टेंडर या कार्य होना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि अभी जांच में 40 में से 30 साइटों पर विज्ञापन माफिया द्वारा हेराफेरी कर निगम को करोड़ों का चूना लगाने का मामला सामने आ चुका है।

फिलहाल 150 यूनीपोल और 297 बिल्डिंग रैंप के मामले की जांच होनी बाकी है। सूरी ने बताया कि 2007 से भाजपा सत्ता में है और उसी समय से भाजपा नेताओं की सांठ-गांठ से विज्ञापन माफिया विज्ञापन साइट शिफ्ट कर निगम को चूना लगा रहा है।

उन्होंने बताया कि भाजपा ने जानबूझकर पुराने टेंडर में ऐसी गैप रखी जिससे विज्ञापन माफिया को फायदा पहुंचाकर कमाई की जा सके। स्थाई समिति के बार-बार आदेश के बाद भी नई डिजिटलाइज्ड विज्ञापन नीति लाने में नेता सदन ने महीनों से अड़ंगा लगा रखा है।

सूरी ने इस मामले की निष्पक्ष जांच के लिए उपराज्यपाल को पत्र लिखने का फैसला किया है। उन्होंने कहा है कि उपराज्यपाल ने इस मामले की जांच नहीं कराई तो वे इसे लोकायुक्त के दरबार में भी ले जाएंगे।

निगम को डीएमआरसी एड फीस देने को तैयार

दिल्ली मेट्रो में प्रदर्शित होने वाले विज्ञापन की कमाई का 25 फीसदी हिस्सा साउथ एमसीडी को मिल सकेगा। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन, साउथ एमसीडी को आउटडोर विज्ञापन से होने वाली कमाई का हिस्सा देने को तैयार हो गई है। वित्तीय वर्ष से साउथ एमसीडी, दिल्ली मेट्रो में प्रदर्शित होने वाले सभी प्रकार के आउटडोर विज्ञापन से शुल्क वसूल सकेगी।

डीएमआरसी ने यह फैसला सात साल बाद लिया है। दरअसल विज्ञापन से होने वाली कमाई को लेकर एकीकृत नगर निगम द्वारा विज्ञापन शुल्क की मांग की गई थी।

विज्ञापन शुल्क देने की बजाए डीएमआरसी ने हाईकोर्ट से स्टे ले लिया। स्टे होने के चलते निगम को 2007 से डीएमआरसी से किसी भी प्रकार का विज्ञापन शुल्क नहीं मिल रहा था। कोर्ट में मामला विचाराधीन होते हुए भी आखिरकार डीएमआरसी ने शुल्क देने के लिए हामी भर ली है।

बाकायदा इसके लिए साउथ एमसीडी को डीएमआरसी ने पत्र के माध्यम से आश्वस्त किया है। डीएमआरसी से विज्ञापन शुल्क वसूलने के लिए एमसीडी और डीएमआरसी के बीच कई बैठकें हुई थीं। दोनों ही निकायों द्वारा अपना-अपना पक्ष रखे जाने के बाद आखिरकार डीएमआरसी, साउथ एमसीडी को आउट डोर विज्ञापन से होने वाली कमाई का 25 फीसदी हिस्सा देने को तैयार हो गया है।

डीएमआरसी द्वारा विज्ञापन शुल्क का भुगतान करने पर निगम के राजस्व में सालाना करीब 15 से 20 करोड़ रुपए की बढ़ोत्तरी होगी।