पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर
डाउनलोड करेंनई दिल्ली। एक डॉलफिन को नया जीवन देने से मशहूर हुए ब्रिटिश सर्जन केविन कैरॉल जल्द ही एक भारतीय सैनिक के पैरों को पंख लगाएंगे। मैराथन धावक मेजर देवेंदर पाल सिंह 1999 के कारगिल युद्ध में विकलांग हो गए थे। कैरॉल उन्हें बेहतर नकली पैर देंगे जिससे देवेंदर विकलांग ओलंपिक्स में भाग लेने का सपना पूरा कर पाएंगे।
देवेंदर भारत के एकमात्र ब्लेड रनर हैं। उन्होंने नौ मैराथन में भाग लिया है। अच्छे नकली पैर न होने से उनका पैर लगातार लहुलुहान हो जाता है। हाल में सिंह का एक वीडियो यू-ट्यूब पर देखने के बाद कैरॉल ने उन्हें खुद फोन किया। अमेरिका आने का न्योता दिया और नए पैर लगाने का वादा किया।
डॉलफिन ही नहीं, कैरॉल ने एक ऑस्ट्रेलियाई पर्वतारोही वारेन मैकडोनाल्ड को भी पैर लगाया है। एक पर्वतारोहण दुर्घटना के बाद उनके दोनों पैर जांघ के पास से काटने पड़े थे। कैरॉल के दिए पैरों की मदद से मैकडोनाल्ड ने दुर्घटना के छह साल बाद किलिमंजरो पर चढ़ाई की और नकली पैरों से पर्वत लांघने वाले वे पहले व्यक्ति बने!
कैरॉल मेजर सिंह के लिए भगवान से कम नहीं है। देवेंदर पाल सिंह बड़ी बड़ी कंपनियों से मदद मांग कर थक चुके थे तब कुछ दिन कैरॉल ने उन्हें संपर्क किया। वे कहते हैं - कैरॉल का फोन आधी रात को आया और उनकी बातें एक सपने की तरह लगीं। काफी देर बाद विश्वास हुआ कि कैरॉल का निमंत्रण सच था।
कारगिल युद्ध में एक बम के गोले से देविंदर बुरी तरह घायल हो गए। जि़न्दगी बैसाखियों पर आ गई। गैंगरीन होने से दायाँ पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। सेना ने नकली पैर तो लगवा दिया मगर ताकत कहाँ से देती। डीपी ने हार नहीं मानी। उन्होंने सेना के एडवेंचर गेम्स में भाग लेने की इच्छा ज़ाहिर की। मगर उनकी हालत देख कर अधिकारियों ने उन्हे ऐसा नहीं करने दिया। तब डीपी ने संकल्प किया कि वह कुछ ऐसा कर गुजरेंगे जिससे यह साबित कर सकें असली ताक़त दिमाग में होती है पैरों में नहीं।
वे कहते हैं - मैंने 2009 में एक मैराथन का विज्ञापन देखा और यह भूल कर कि मै एक अपाहिज हूँ फॉर्म भर दिया। मगर नकली पैर से मैं बमुश्किल चल लेता था, दौड़ता कैसे? रोज़ आठ किलोमीटर चलने की प्रैक्टिस की। मैं उछल-उछल कर चला। बीच में कई बार हिम्मत टूटी मगर लोगों ने उत्साह बढ़ा दिया। कटा हुआ घुटना लहूलुहान हो गया मगर मैंने मैराथन पूरी की। फिर तो वे हर मैराथन में भाग लेने लगे।
उनका हौसला और जिद देख कर लेफ्टिनेंट जनरल मुकेश सभरवाल ने 2011 में उन्हें अमेरिका से 'ब्लेड' वाला पैर मंगा कर दिया जो उनके पैर को स्पीड और बाउंस दे सके। मगर ये बहुत जल्दी खऱाब हो जाते है।सेना की नौकरी छोड़ डी पी अब बैंक अधिकारी हैं। आज भी 40 स्प्लिन्टर उनके शरीर में हैं जिन्हें वे 'मैडल' मानते हैं। उन्हें उम्मीद है कैरॉल से प्रोस्थेटिक पैर लगवाकर वे जल्द ही पैरालिम्पिक खेलों में भाग ले सकेंगे।
अगली स्लाइड में पढ़िए डॉलफिन को नकली पूंछ लगाकर मशहूर हुए थे डॉ. केविन कैरॉल
Copyright © 2021-22 DB Corp ltd., All Rights Reserved
This website follows the DNPA Code of Ethics.