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कोई भी भाषा अपनी या पराई नहीं होती, लेखकों ने व्यक्त किए विचार

7 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. कोई भी भाषा अपनी या पराई नहीं होती है। उसे अनुवाद करके अपना बनाया जा सकता है। अगर अंग्रेजी से भी अनुवाद हो तो उसकी तकनीकी चीजें भी हमारी हो सकती हैं। जरूरत है अनुवाद को इस स्तर तक विकसित करने की, जिससे जो साहित्य हमारा नहीं है वह भी हमारा हो जाए। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा का। मैत्रेयी पुष्पा दैनिक भास्कर समूह द्वारा भारत का भविष्य और हिंदी भाषा की तलाश में एक देश विषय आयोजित चर्चा पर बोल रही थीं।

त्रिवेणी कला संगम सभागार में आयोजित समारोह के दौरान उन्होंने कहा कि हिंदी को जैसे साहित्य की भाषा कहते हैं, हम उसकाे क्लिष्ट बनाकर आगे नहीं जा सकते हैं। लिहाजा भाषा का सरलीकरण बहुत जरूरी है। लेखकों को चाहिए कि वे इस बात पर ध्यान दें कि हम क्या लिखते हैं और किसके लिए लिखते हैं।

परिचर्चा की शुरुआत अहा जिंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव ने हिंदी भाषा की समस्याओं से संबंधित तीन पहलुओं से की। उन्होंने कहा, पहला पहलू सरकार और सरकारी नीतियों से जुड़ा है। दूसरा पहलू समाज से जुड़ा है कि समाज कहां हैं भाषा के मामले में। तीसरा पहलू अर्थव्यवस्था, कॅरियर, विकास, संस्कृति, बाजार आदि से जुड़ता है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या हिंदी का कोई ऐसा भी आंदोलन हो सकता है जिसकी सैकड़ों हजारों रचनात्मक शाखाएं फूट निकलें।
जेएनयू में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक मणींद्र ठाकुर ने कहा कि हिंदी भाषा का सवाल शुद्ध रूप से सामाजिक न्याय का सवाल है। उन्होंने हिंदी में उपलब्ध सामग्री को ज्ञान की मुख्य धारा से जोड़ने और हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के विकास की जरूरत पर बल दिया।
वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने ने कहा कि हिंदी ज्ञान विज्ञान की भाषा होनी चाहिए। हिंदी पाठ्यपुस्तकों में मौजूद 90 फीसदी शब्द समझ से बाहर हैं। वहीं वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश ने कहा कि पाठ्यपुस्तकों ने पाठकों को हिंदी से दूर किया है। पाठ्यपुस्तकों को अधिक कठिन बनाया गया है। साहित्य और उसकी भाषा में बदलाव की जरूरत है। एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक प्रो.कृष्ण कुमार ने यूपीएससी परीक्षा में सी-सैट विवाद पर चुटकी लेते हुए कहा कि संघ लोकसेवा आयोग जैसे संस्थान में अनुवाद की जो हालत है वह संस्थान के आलस्य को दर्शाती है। इस तरह के कुप्रबंधन को देखकर लगता है कि कहीं हम भटक तो नहीं गए हैं।