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हिरणवन कोठी डकैती कांड : 35 साल पुराने मामले में साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपी बरी

3 वर्ष पहले
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ग्वालियर.   सिंधिया परिवार से जुड़े शहर के बहुचर्चित हिरणवन कोठी डकैती कांड में 415 माह (लगभग 35 साल) बाद शुक्रवार को विशेष न्यायाधीश रविंदर सिंह ने फैसला सुनाया। कोर्ट ने  साक्ष्य के अभाव में सभी 16 आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया सहित पांच लोगों की मौत हो चुकी है। इसी तरह मामले के 36 गवाहों में से 13 लोगों का निधन हो चुका है। इनमें राजमाता विजयाराजे सिंधिया, पूर्व सांसद नारायण कृष्ण शेजवलकर, सरदार एससी आंग्रे, पूर्व मंत्री शीतला सहाय, पूर्व विधायक आैर महापौर रहे माधवशंकर इंदापुरकर शामिल हैं।  इस पूरे मामले में खास बात यह रही कि परिवादी चित्रलेखा आंग्रे ट्रॉयल के दौरान एक भी बार कोर्ट में उपस्थित नहीं हुईं। जबकि उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया गया था।

 

विशेष न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि प्रकरण में कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं हैं जिन्हें स्वीकार किया जा सके। अभियोजन पक्ष ने जिन चार गवाहों के बयान दर्ज करवाए, उनमें से किसी ने भी आरोपियों के संबंध में घटना को प्रमाणित करने वाला कोई साक्ष्य न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया है। प्रकरण में आरोपियों की ओर से अभिभाषक मुकेश गुप्ता, संजय शर्मा, अभिषेक शर्मा ने और शासन की ओर से अपर लोक अभियोजक जागेश्वर सिंह भदौरिया ने पैरवी की।


इन्हें बनाया था गवाह:  राजमाता विजयाराजे सिंधिया, माधवशंकर इंदापुरकर, नारायण कृष्ण शेजवलकर, शीतला सहाय, गंगाराम बांदिल, सरदार एससी आंग्रे, मोहन सिंह, दयाशंकर वाजपेयी, बाबूलाल पाल, श्रीमति अंजरिबाई शिंदे, माधवराव शिंदे, पीआर अरगडे, शंकरलाल इलेक्ट्रीशियन (इन सभी का निधन हो चुका है),  किरन शिंदे,  बद्री, बिरसाराम, शारदा. राजेंद्र शर्मा, अरगडे, गनपत सिंह यादव, रुस्तम सिंह, जंग बहादुर सिंह, लोकेंद्र सिंह तोमर, रमेश पठारिया, बीबी गिरी, एसके मिश्रा, प्रशासनिक अधिकारी (टेलीफोन एक्सचेंज, ग्वालियर), प्रशासनिक अधिकारी पासपोर्ट (नई दिल्ली), डीएम कार्यालय (ग्वालियर), बिल विभाग प्रभारी (मप्र विद्युत मंडल),  ध्यानेंद्र सिंह, राजेंद्र प्रसाद, गंभीर सिंह,  पन्नालाल, आरएस वर्मा।

 

इन्हें बनाया था आरोपी 

माधवराव सिंधिया, चंद्रकांत मांढरे, महेंद्र प्रताप सिंह, नरेंद्र सिंह, शरद शुक्ला (इन सभी का निधन हो चुका है), केपी सिंह (पूर्वमंत्री) अशोक शर्मा, अरुण सिंह तोमर ( अब भाजपा में) राजेंद्र सिंह तोमर, राम उर्फ मुन्ना भार्गव, विलासराव लाड, बाल खांडे, उदयवीर सिंह, रविंद्र सिंह भदौरिया, अमर सिंह भोंसले, रमेश शर्मा।  

 

इन धाराओं में लगे थे आरोप  
धारा 395 सहपठित धारा 397 भारतीय दंड संहिता विकल्प में धारा 120 बी सहपठित धारा 395 भारतीय दंड संहिता सहपठित धारा 13 मप्र डकैती एवं व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम 1981 व धारा 452 तथा 506 बी भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज किया गया था। 

 

26 दिन में कराई गवाही और सुना दिया फैसला  

सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष पांच साल से अधिक वर्ष पुराने प्रकरणों को जल्द से जल्द निराकृत करने के निर्देश दिए थे। इसी क्रम में चार अप्रैल को विशेष न्यायाधीश रविन्दर सिंह ने  23 से लेकर 27 अप्रैल के बीच कुल 35 गवाहों को बयान दर्ज कराने के लिए तलब किया।  14 से 18 मई तक गवाहों के कथन दर्ज कराए गए और न्यायालय ने अपना फैसला भी सुना दिया। हालांकि आज हुई गवाही में गणपत ने बताया कि घटना वाले दिन चंद्रकांत व महेंद्र प्रताप सिंह वहां मौजूद थे और उनके हाथ में हथियार भी थे। दोनों ने उसे भगा दिया था।  

 

 

 

बरी होने के बाद बोले- 35 साल तक आरोपी रहना कष्टदायी रहा, कोर्ट का शुक्रिया

 

35 साल पुराने हिरणवन कोठी डकैती मामले में शुक्रवार को आए फैसले से इस बहुचर्चित कांड का पटाक्षेप हो गया। फैसला सुनने के बाद कोर्ट में उपस्थित दोषमुक्त किए गए आरोपियों का दर्द खुशी के साथ छलक आया। सभी ने कहा- आरोपी के तौर पर इतने साल समाज में रहना कष्टदायी रहा। कोर्ट ने अब भरपाई की, शुक्रिया।

 

प्रतिक्रिया

- बाल खांडे ने कहा कि न हिरणवन कोठी देखी न कभी पैर रखा। पूरा प्रकरण राजनीतिक था। 35 साल तक आरोपी बने रहना कष्टकारी रहा। 
- रविंद्र सिंह भदौरिया ने कहा कि सत्य की विजय हुई है। समय जरूर लगा लेकिन न्यायालय पर पूरा विश्वास था। 
अशोक शर्मा ने बताया कि सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं। हम सभी सत्य के रास्ते पर थे।  
- अरुण सिंह तोमर ने बताया कि आरोपी के तौर पर सामाजिक प्रतिष्ठा का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई आज माननीय न्यायालय ने अपने निर्णय से कर दी।
- रमेश शर्मा ने बताया कि असत्य पर सत्य की विजय हुई है। हमने न्यायालय में विश्वास रखते हुए आरोपों का डटकर मुकाबला किया। न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हैं। 

 

यह है मामला: 11 अक्टूबर 1983 को सरदार एससी आंग्रे की पुत्री श्रीमति चित्रलेखा ने कोर्ट में परिवाद पेश कर आरोप लगाया था कि 13 अगस्त 1983 को शाम 5-6 बजे के बीच माधवराव सिंधिया को छोड़कर शेष आरोपी अपने साथियों के साथ कोठी पर आए और कर्मचारी व चौकीदारों को बंदूक की नोक पर खदेड़ दिया। घर में पांच पालतू कुत्ते थे, जिनमें से केवल 2 मिले, एक को मार डाला और 2 कुत्तों व घरेलू सामान आरोपीगण अपने साथ ले गए। घटना के समय सरदार एससी आंग्रे इंग्लैंड गए हुए थे और वे स्वयं दिल्ली में थी। फोन पर उन्हें घटना की जानकारी दी गई।

 

 

 

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