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देश में भी होगी नेट न्यूट्रैलिटी, इस बड़े फैसले के बारे में वो सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

कंटेंट के साथ भेदभाव के मुद्दे पर नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर भारत में अप्रैल 2015 में बहस शुरू हुई थी।

Danik Bhaskar | Jul 12, 2018, 04:33 PM IST

गैजेट डेस्क. टेलीकॉम कमीशन ने नेट न्यूट्रैलिटी पर दी गई टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है। इसके बाद अब कोई इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर इंटरनेट के कंटेंट या सर्विस के साथ कम या ज्यादा स्पीड के जरिए भेदभाव नहीं कर पाएगा और न ही इन्हें ब्लॉक कर सकेगा। ट्राई ने अपनी सिफारिश में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच ऐसे किसी भी समझौते पर रोक लगाने की बात कही थी, जिससे इंटरनेट के कंटेंट के साथ भेदभाव हो।

टेलीकॉम सचिव अरुणा सुंदरराजन ने कहा कि 'कमीशन ने ट्राई की सिफारिशों के आधार पर नेट न्यूट्रैलिटी को मंजूरी दे दी है। हालांकि संभावना है कि कुछ महत्वपूर्ण सर्विसेस को इस दायरे से बाहर रखा जा सकता है।'

क्या है नेट न्यूट्रलिटी?
- नेट न्यूट्रलिटी यानी अगर आपके पास इंटरनेट प्लान है तो आप हर वेबसाइट पर हर तरह के कॉन्टेंट को एक जैसी स्पीड के साथ एक्सेस कर सकें।
- नेट न्यूट्रलिटी के मायने ये भी हैं कि चाहे आपका टेलिकॉम सर्विस प्रोवाइडर कोई भी हो, आप एक जैसी ही स्पीड पर हर तरह का डाटा एक्सेस कर सकें।
- कुल मिलाकर, इंटरनेट पर ऐसी आजादी जिसमें स्पीड या एक्सेस को लेकर किसी तरह की कोई रुकावट न हो।

ट्राई की सिफारिशों की अहम बातें
1. ट्राई ने नवंबर 2017 में टेलीकॉम कमीशन को नेट न्यूट्रैलिटी पर 55 पेज की सिफारिशें भेजी थीं। इसमें ट्राई ने नेट न्यूट्रलिटी के लिए लाइसेंस की शर्तों में बदलाव करने को कहा है।
2. सर्विस प्रोवाइडर ऐसा कोई समझौता नहीं कर सकते, जिससे इंटरनेट एक्सेस में भेदभाव हो। सर्विस प्रोवाइडर ऐसा कोई समझौता नहीं कर सकते, जिससे इंटरनेट एक्सेस में भेदभाव हो।
3. पब्लिक इंटरनेट के बजाय अगर सर्विस प्रोवाइडर सिर्फ अपने नेटवर्क में कॉन्टेंट मुहैया कराता है, तो उस पर ये नियम लागू नहीं होंगे।
4. ट्राई ने भेदभाव को भी डिफाइन किया है। किसी सर्विस को ब्लॉक करना, डिग्रेड करना, स्पीड कम करना या किसी को ज्यादा स्पीड मुहैया कराना भेदभाव माना जाएगा।
5. खास कॉन्टेंट के लिए ज्यादा स्पीड दी जा सकती है।लेकिन खास कॉन्टेंट को ज्यादा स्पीड देने से इंटरनेट की ओवरऑल क्वालिटी पर असर नहीं पड़ना चाहिए।

नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर भारत में कब-कब क्या हुआ?

अप्रैल 2015 फेसबुक ने भारत में 'फ्री बेसिक प्रोग्राम' और टेलीकॉम कंपनी एयरटेल ने भी इसी तरह का 'एयरटेल जीरो' प्लान लॉन्च करने की घोषणा की। इसको नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ बताया गया।
जुलाई 2015 टेलीकॉम डिपार्टमेंट (DoT) ने नेट न्यूट्रैलिटी पर अपनी रिपोर्ट पेश की, जिसमें कहा गया कि इंटरनेट पर यूजर्स के अधिकारों को सुरक्षित करने की जरुरत है।
फरवरी 2016 ट्राई ने 'प्रोहीबिशन ऑफ डिस्क्रिमिनेटरी टैरिफ फॉर डाटा सर्विस रेगुलेशन 2016' के नाम से आदेश जारी किया। इस आदेश में साफ तौर से कहा गया कि फ्री में कुछ वेबसाइट का एक्सेस देने वाले सभी डेटा सर्विस अवैध हैं।
जनवरी 2017 ट्राई ने नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर लोगों से 20 सवालों के जवाब मांगे।
नवंबर 2017 ट्राई ने नेट न्यूट्रैलिटी पर 55 पेज की सिफारिश टेलीकॉम कमीशन को सौंपी।

टेलीकॉम कंपनियां क्यों कर रही थीं विरोध?
- टेलीकॉम कंपनियां शुरू से ही नेट न्यूट्रैलिटी का विरोध कर रही थीं। इसके लिए सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) ने ट्राई को दलील दी कि भारत में कोई भी कंपनी तभी इंटरनेट टेलीफोनी सर्विस मुहैया करा सकती है जब उसे इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885 के सेक्शन-4 के तहत स्पेशल लाइसेंस मिला हो। लिहाजा स्काइप, फेसबुक, वॉट्सऐप जैसी कंपनियां तकनीकी तौर पर बिना लाइसेंस के सर्विसेस दे रही हैं।
- टेलीकॉम कंपनियों की यह भी दलील है कि वे डेटा यूसेज से पैसा कमाती हैं, लेकिन बैंडविड्थ का उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता। सोशल साइट्स और ई-कॉमर्स कंपनियां टेलीकॉम कंपनियों के इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन अपने रेवेन्यू में उन्हें कोई शेयर नहीं देतीं।