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6300 साल पुरानी होकर भी आज की संघर्ष गाथा- अर्थला

6300 साल पहले की कहानी होकर भी अर्थला आज की कहानी लगती है। किरदार और घटनाएं आसपास की ही महसूस होती हैं।

dainikbhaskar.com | Last Modified - May 08, 2018, 10:00 PM IST

6300 साल पुरानी होकर भी आज की संघर्ष गाथा- अर्थला

देवकी नंदन खत्री की लिखी ‘चंद्रकांता’ को जब नीरजा गुलेरी ने परदे पर उतारा था, तो हर दर्शक एक तिलिस्म में बंध-सा गया था। वो न दूर हो सकता था, और न ही किरदारों को भुला सकता था। विवेक कुमार की ‘अर्थला’ भी कुछ ऐसी ही है। पहले पन्ने से लेकर आखिरी तक, अर्थला आपके साथ चलेगी। न आपको भटकने देगी और न ही आप उसे पढ़े बिना छोड़ पाएंगे।

काल्पनिक पौराणिक गाथाएं बीते कुछ अरसे में काफी पढ़ने मिली है। अमीश त्रिपाठी की शिवत्रयी सीरीज, देवदत्त पटनायक की जय महाभारत, मेरी गीता, मेरी हनुमान चालीसा और अश्विन सांघी की ‘कीपर्स ऑफ द कालचक्र’ या फिर आनंद नीलकंठन की किताबें, बहुत हैं। इस बीच बिल्कुल नई अर्थला इनसे अलग है।

6300 साल पहले की कहानी पर रची गई अर्थला उन लोगों के लिए पठनीय है, जो इतिहास और खासकर ऐतिहासिक समयकाल में रची गईं पौराणिक गाथाएं पढ़ना पसंद करते हैं। इसकी सबसे अच्छी बात ये है कि इतनी पुरानी होने के बाद भी ये आज की कहानी लगती है। गाथा के किरदार भी आज के, आसपास के ही लगते हैं। संभव है लेखक जो कहना चाहता था, लिखना चाहता था, उसे व्यक्त करने के लिए उसने हड़प्पा काल को चुना। लेखक की कल्पनाशीलता और उसका बारीकी से लेखन करने में विवेक पूरी तरह सफल हुए हैं।

अर्थला में क्या है


ये कहानी है विधान की, जो भाला और तलवार चलाने में माहिर है। वो अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता है इसलिए उसने शस्त्र ज्ञान लिया है। कहानी में विधान के साथ उसका चचेरा भाई भी है-सत्तू। पूरी कहानी में मस्तमौला सत्तू, धीर-गंभीर विधान का ही विपरीत रूप दिखता है। लेखक ने शायद कहानी और पाठकों की मांग पर ही सत्तू के किरदार को रचा है क्योंकि शायद तभी कहानी आगे बढ़ पाती।

पहले अध्याय से विधान अपने गुरू को क्या गुरू-दक्षिणा देनी है,यह सोचने में व्यस्त रहता है लेकिन आंखों के सामने गुरू की हत्या के बाद कहानी बिल्कुल बदल जाती है। पिता के साथ विधान अब गुरू की हत्या का भी बदला लेना चाहता है।

अगले अध्याय में अर्थला राज्य बनकर सामने आता है, जिसे विधान की मदद की जरूरत है क्योंकि उसके पास एक खास सिद्धी है। विधान के अर्थला पहुंचने के बाद असली कहानी शुरू होती है। राजनीति, षडयंत्र, वीरता, संघर्ष, देव, असुर, दानव, सब कुछ इन अध्यायों में मिलता है, जो न सिर्फ कहानी आगे बढ़ाते हैं, बल्कि पाठक के सामने चरित्र बनकर उभर भी आते हैं। कहानी के पात्रों से पाठक का ये जुड़ाव ही अर्थला की सबसे अच्छी बात है। आप पढ़ेंगे तो इस तिलिस्म को महसूस भी करेंगे।

अर्थला को लेखक ने चार भागों में लिखना तय किया है। संग्राम- सिंधु गाथा पहला खंड है। इसकी अप्रोच अलग है, जो हिंदी के पाठकों को जरूर भाएगी। यह किसी गाथा का हिंदी अनुवाद नहीं है, इसलिए पाठकों को सीधे हिंदी से जोड़ने का काम भी करेगी। हालांकि अर्थला अंग्रेजी के पाठकों के लिए भी होनी चाहिए।

क्यों पढ़ें

हिंदी के पाठक हैं तो। साथ ही ऐतिहासिक गाथाओं में रुचि हो तो जरूर पढ़ना चाहिए। और अगर अंग्रेजी से हिंदी किताबों की तरफ रुख करना चाहें, तो अर्थला आदर्श मददगार हो सकती है।

क्यों न पढ़ें

अंग्रेजी में लिखी गई काल्पनिक पौराणिक कथाएं पसंद करते हों, तो न पढ़ें। अमीश त्रिपाठी, अश्विन सांघी, आनंद नीलकंठन या देवदत्त पटनायक की गाथाओँ से तुलना करने या उसी तरह के लेखन की खोज में हों, तो न पढ़ें, अर्थला इनसे बिल्कुल अलग है।

लेखक के बारे में
विवेक कुमार मूल रूप से इंजीनियर हैं। जौनपुर, फैजाबाद, वाराणसी और इलाहाबाद में शुरुआती पढ़ाई के बाद मेरठ से डिग्री ली है। कुछ समय तक प्राइवेट फर्म में नौकरी भी की, लेकिन मन नहीं लगा तो ग्राफिक्स ब्लॉग की तरफ मुड़ गए। फिलहाल लखनऊ में रहकर लेखन कर रहे हैं।

अर्थलाः संग्राम-सिंधु गाथा
प्रकाशकः हिंद युग्म
लेखक-विवेक कुमार
कीमत-175 रुपए मात्र
अमेज़न पर उपलब्ध

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