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भास्कर संपादकीय: आस्था के उत्पीड़न का वीभत्स नृत्य समाप्त

अदालत ने आसाराम को मृत्यु पर्यन्त सींखचों के पीछे डालने का फैसला कर एक नई आशा जगा दी है।

कल्पेश याग्निक | Last Modified - Apr 26, 2018, 07:04 AM IST

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    कल्पेश याग्निक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं।

    एक नन्हीं मासूम का उत्पीड़न कर, स्वयंभू आसाराम नृत्यरत था। अहंकार में चूर। असंख्य अनुयायियों की आस्था का आपराधिक दुरुपयोग कर, कानून का मखौल उड़ा रहा था।

    किन्तु विशेष अजा-जजा न्यायालय ने आसाराम को मृत्यु पर्यन्त सींखचों के पीछे डालने का फैसला कर एक नई आशा जगा दी है। हां, यदि यह आजीवन कारावास न होता तो वैसी आशा नहीं जगती।
    यह फैसला अभूतपूर्व है। स्पष्ट है। प्रेरक है। न्यायोचित है।
    यह उस समय आया है, जब समूचा राष्ट्र बच्चियों-महिलाओं की गरिमा पर हो रहे पाश्विक हमलों से आहत और उद्वेलित है। असुरक्षा और अविश्वास का वातावरण बन गया है।
    आसाराम जैसे प्रभावशाली, शक्तिशाली और वैभवशाली दुष्कर्म आरोपी का कानून की बेड़ियों में जकड़ा जाना ही अविश्वसनीय था। अंधश्रद्धा विराट होती है। किसी सच और तर्क को नहीं मानती। और आस्था से ऊपर कानून रखने की हिम्मत जुटाना मुश्किल काम है। जोधपुर पुलिस ने किन्तु ऐसा ही किया। कई बाधाएं आईं। तीन-तीन गवाहों की हत्या हो गई। किन्तु पुलिस व अभियोजन ने मूल साक्ष्य मिटने न दिए। पुलिस के कर्तव्य विमुख होने के कारनामों से भरा पड़ा भारतीय इतिहास, अासाराम प्रकरण में जोधपुर पुलिस की अच्छी भूमिका को याद रखेगा।
    पीड़ित बच्ची और परिवार ने सबसे बड़ा साहस दिखाया। लड़े।
    सर्वोच्च प्रशंसा की जानी चाहिए न्यायालय की। जज मधुसूदन शर्मा ने इस न्याय से समूचे दुष्कर्म-विरोधी माहौल को कानूनी मजबूती प्रदान की है। जो इसलिए आवश्यक है, चूंकि लोगों की आशाओं का अंतिम केंद्र कोर्ट ही है। न्याय का मार्ग दुरूह, लम्बा और संताप भरा होता है। बस, चलने वाला चाहिए। इस बार सभी दृढ़ता से चले। चलते रहे।

    न्यायालय ने जर्जर बूढ़ी हो चुकी उस रहम की अपील को खारिज कर बहुत अच्छा किया जिसमें आसाराम की वृद्धावस्था का भावुक उल्लेख किया गया था। राम रहीम भी ऐसे ही अपने सामाजिक कार्यों के कवच को दया का भिक्षा-पात्र बनाकर कोर्ट में लाया था। आशा है, कम उम्र के दुष्कर्मियों की इससे रूह कांप उठेगी।

    अब राष्ट्र का न्याय में नए सिरे से विश्वास जगा है। बनाए रखने की चुनौती है। प्रश्न केवल इतना है कि कहीं यह केवल आसाराम तक सीमित न रह जाए। हजारों दुष्कर्मी चारों ओर स्वच्छंद फैले हैं। अधिकांश दो-दो बार ऐसा पाप कर चुके हैं। वे बचे क्यों रहते हैं?
    प्रत्येक पुलिस वाले को यह अवसर प्रेरणा देना चाहिए। कि राष्ट्र उन्हें देख रहा है। अभियोजन का उत्साहवर्धन होना चाहिए कि न्यायालय में क्या मान्य होगा, कैसे मान्य होगा - सबकुछ उन्हीं पर है।
    और जैसे दुष्कर्म की नई परिभाषा नए कानून में लिखी गई वैसे ही न्यायालय, न्याय की ऐसी ही सुस्पष्ट परिभाषा लिखते रहेंगे। और इन सबके लिए हमेशा आरोपी आसाराम जैसा पैसे वाला-जनाधार वाला हो, ऐसा नहीं होगा। कि जिस पर मुकदमा चलने और सजा देने पर इतना प्रचार और प्रशंसा ही मिले।

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    कल्पेश याग्निक।
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