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स्वायत्तता एेसी न हो जो शिक्षा को पहुंच से बाहर कर दे

यूजीसी ने जेएनयू, बीएचयू और एएमयू जैसे संस्थानों सहित उच्च शिक्षा के 62 संस्थानों को स्वायत्त दर्जा दे दिया।

समर्थ कश्यप | Last Modified - Apr 10, 2018, 05:09 AM IST

स्वायत्तता एेसी न हो जो शिक्षा को पहुंच से बाहर कर दे

गत फरवरी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अपनी वेबसाइट पर एक दस्तावेज जारी किया, जो कॉलेजों की स्वायत्तता कायम रखने और उसके लिए निर्धारित मानकों के संबंध में था। 20 मार्च को यूजीसी ने जेएनयू, बीएचयू और एएमयू जैसे संस्थानों सहित उच्च शिक्षा के 62 संस्थानों को स्वायत्त दर्जा दे दिया। इस पर मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेड़कर ने ट्वीट किया, ‘उदार नियामक व्यवस्था के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विज़न के अनुसार ही यह कदम उठाया गया है।’


इस पूरी स्वायत्तता में शिक्षा संस्थानों को नए कोर्स व शोध कार्यक्रम चलाने, विदेशी फैकल्टी की सेवाएं लेने, अपना सिलेबस तैयार करने, विदेशी छात्रों को प्रवेश देने और आवश्यकता के अनुसार कैम्पस के बाहर संबद्ध इकाइयां और सेंटर खोलने की स्वतंत्रता दी गई है। यह कदम संस्थानों को यूजीसी प्रशासन की परेशानियों से जरूरी स्वतंत्रता देता लगता है लेकिन, यदि गहराई से देखें तो स्वायत्तता के इस दर्जे की बारीकियां एक अलग ही चित्र प्रस्तुत करती है। यह सारी स्वायत्तता एक ही शर्त पर दी गई है कि वे यूजीसी से कोई अनुदान नहीं मांगेंगे। इसके साथ कॉलेज प्रशासन और प्रबंध मंडलों को फीस का ढांचा तय करने की वित्तीय स्वतंत्रता दी गई है।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि होड़ में बने रहने के लिए कॉलेज नए प्रोजेक्ट और कोर्स शुरू करेंगे तो उन्हें अपने फंड खुद जुटाने होंगे, जिसका परिणाम फीस में तीव्र वृद्धि में हो सकता है। यह सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण कदम होगा, क्योंकि पब्लिक यूनिवर्सिटी में एक तबका वंचित पृष्ठभूमि से आता है और महंगी शिक्षा उसके बस की बात नहीं है।


फिर कॉलेज प्रशासनों और बोर्ड को प्रवेश के नियम तय करने की भी पूरी स्वतंत्रता दी गई है। इसमें विश्वविद्यालयों में मौजूदा विविधता घटना का जोखिम है, जिसके कारण असहमति के स्वर काफी घट जाएंगे, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की नींव रही है। दिल्ली यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ और अन्य छात्रों की ओर से इसका विरोध हुआ है पर अभी यह देखा जाना है कि यूजीसी किस दिशा में जाना चाहता है।

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