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Baisakhi 2018: इस साल 14 अप्रैल, शनिवार को है वैशाखी, जानिए इससे जुड़ी ख़ास बातें

14 अप्रैल, शनिवार को वैशाखी है। ये त्योहार पंजाब और हरियाण में खासतौर से मनाया जाता है।

Dainik Bhaskar

Apr 13, 2018, 12:54 PM IST

14 अप्रैल, शनिवार को वैशाखी है। ये त्योहार पंजाब और हरियाण में खासतौर से मनाया जाता है। हर साल यह त्योहार अप्रैल माह में मनाया जाता है। वैसे तो वैशाखी फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है। इस समय गेंहू की फसल पककर तैयार हो जाती है। किसान जब अपनी फसल लहलहाती देखता है तो उसके मन में अपने आप ही उमंग और उल्लास हिलोरे मारने लगता है। इस खुशी को सभी लोग मिलकर नाच-गाकर मनाते हैं। इसी पर्व का नाम वैशाखी है। पंजाब में तरन-तारन की वैशाखी बहुत प्रसिद्ध है, जहां हर साल बहुत बड़ा मेला लगता है। इस जगह सन 1768 में सिक्खों के गुरु श्रीरामदासजी की याद में एक गुरुद्वारा स्थापित किया गया, जिसके पास एक तालाब (सरोवर) भी है। वहां के लोगों का मानना है कि इस पवित्र सरोवर में नहाने से सभी असाध्य रोग दूर हो जाते हैं।

यूं तो वैशाखी का पर्व फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे सिक्खों की कुर्बानी की एक कहानी भी है, जो इस प्रकार है-

जब औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर का कत्ल करवा दिया, तो उनकी शहादत के बाद उनकी गद्दी पर गुरु गोविंद सिंह को बैठाया गया। उस समय उनकी उम्र 9 साल थी। गुरु की गरिमा के लिए उन्होंने अपना ज्ञान बढ़ाया और संस्कृत, फारसी, पंजाबी और अरबी भाषाएं सीखीं। गुरु गोविंद सिंह ने धनुष-बाण, तलवार, भाला चलाने की कला भी सीखी।

उन्होंने सिखों को अपने धर्म, जन्मभूमि और खुद की रक्षा करना सीखाया। उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया। पंच प्यारे भी गुरु गोविंद सिंह की ही देन है। केशगढ़साहिब में आयोजित सभा में गुरु गोविंद सिंह ने ही पहली बार पंच प्यारों को अमृत छकाया था। इस घटना को देश के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उस समय देश में धर्म, जाति जैसी चीजों का बहुत ज्यादा बोलबाला था।
इस सभा में मौजूद सभी लोगों ने न सिर्फ सिख धर्म को अपनाया, बल्कि सभी ने अपने नाम के आगे सिंह भी लगाया। गुरु गोविंद सिंह भी पहले गोविंद राय थे। इस सभा के बाद ही वे गुरु गोविंद सिंह कहलाए। तभी से यह दिन खालसा पंथ की स्थापना के उपलक्ष्य में वैशाखी के तौर पर मनाया जाता है।

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