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छत्तीसगढ़ में तैनात होगी स्थानीय आदिवासियों से लैस पहली एंटी नक्सल यूनिट बस्तरिया; नेटवर्किंग पर फोकस

3 वर्ष पहले
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रायपुर. छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में सोमवार से स्थानीय आदिवासियों की फोर्स बस्तरिया काम करना शुरू करेगी। सीआरपीएफ की इस नई बटालियन के सभी जवान स्थानीय आदिवासी होंगे, जो स्थानीय भाषा और इलाके को भलीभांति समझते हैं। सीआरपीएफ ने ही इन जवानों को ट्रेनिंग दी है। अंबिकापुर में गृहमंत्री राजनाथ सिंह की मौजूदगी में इस बटालियन की पासिंग आउट परेड होगी। सुकमा में तैनात एक अधिकारी के मुताबिक, इस यूनिट का मकसद एंटी नक्सल ऑपरेशन के दौरान मजबूत स्थानीय नेटवर्क और इलाकाई जानकारी का बेहतर उपयोग करना है। इस यूनिट की तैनाती भी घोर नक्सल प्रभावित इलाकों में होगी। 

 

 

महिलाओं की मौजूदगी 33 फीसदी 
- बस्तरिया बटालियन का नंबर 241 है। इसे सीआरपीएफ ने तैयार किया है और पहली बार में इसमें 534 आदिवासी युवाओं को शामिल किया गया है। इसमें 33 फीसदी महिलाएं हैं, यानी 189 महिला कॉन्स्टेबल।

 

ये होगा बस्तरिया का काम
- स्थानीय युवाओं से सजी बस्तरिया बटालियन को तुरंत एंटी नक्सल ऑपरेशन में लगाया जाएगा। 
- एक अफसर के मुताबिक, ये फोर्स सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जैसे इलाकों में तैनात की जाएगी, जो कि बुरी तरह नक्सल प्रभावित हैं।
- इस दल में सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर, ओडिशा, तेलंगाना और आंध्र के सीमाई इलाकों के आदिवासियों को शामिल किया गया है। इन्हें खासतौर पर उन इलाकों में अभियान चलाने के लिए तैयार किया गया है, जहां अभी तक फोर्सेस को लोकल इंटेलिजेंस और स्थानीय कॉर्डिनेशन में कमी की वजह से सबसे ज्यादा जवान खोने पड़े हैं। 

 

44 हफ्ते जंगलों में हुई ट्रेनिंग
- अफसर ने बताया कि बस्तरिया के जवानों को 44 हफ्ते तक जंगल में युद्ध, हथियार, नक्शा पढ़ने, कानून और बिना हथियार के लड़ाई की ट्रेनिंग दी गई है।
- पासिंग आउट परेड के बाद ये जवान नक्सल प्रभावित मुख्य इलाकों में कोबरा और सीआरपीएफ बटालियन के साथ मिलकर काम करेंगे।
- मौजूदा समय में सीआरपीएफ के 35 हजार जवान नक्सल विरोधी अभियानों को अंजाम देते हैं।

 

एंटी नक्सल ऑपेरशंस के लिहाज से बस्तरिया में खास क्या?
1. सुकमा में तैनात एक सीआरपीएफ अधिकारी ने DainikBhaskar.com को बताया कि सीआरपीएफ की इस खास बटालियन के जवान सुरक्षाबलों और स्थानीय लोगों के बीच कड़ी का काम करेंगे। जवानों के इसी इलाके के होने से वे आसानी से गांव के लोगों में घुल-मिल सकते हैं। ऐसे में जवानों के जरिए नक्सलियों से जुड़ी अंदरूनी बातें पता चलेंगी।    
2. जवानों के लिए भाषा की दिक्कत खत्म होगी। सुकमा के स्थानीय लोगों की भाषा को सीआरपीएफ के जवान आसनी से समझ नहीं पाते हैं। बस्तरिया के जवान उनके साथ होंगे तो वे नक्सल ऑपरेशन में लोगों से बेहतर तरीके से पूछताछ कर सुराग जुटा पाएंगे।  
3. बस्तरिया के जवानों को स्थानीय इलाकों की पूरी जानकारी है। ऐसे में सुकमा के सभी इलाकों में जरूरत के हिसाब से एक-एक प्लाटून के साथ 20 से 30 को जवान सीआरपीएफ की हर प्लाटून के साथ रहेंगे। जो उनके लिए गाइड का काम करेंगे।   
4. जवानों को स्थानीय लोगों की परंपराओं को समझ रहेगी। इसलिए पैरामिलिट्री के जवानों को लोगों की परंपराएं और त्योहार के बारे में जानकारी मिलेगी, इससे कई तरह की गलत फहमियां दूर होंगी। 

 

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