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पाक चुनाव में बंटा जनादेश लाने की जुगत में लगी फौज- भास्कर संपादकीय

चुनाव के पहले शरीफ को जितना बदनाम किया जा सके, लोगों में उनकी लोकप्रियता को जितना घटाया जा सके, उतनी कोशिशें जारी हैं।

Dainik Bhaskar

Jul 12, 2018, 11:47 PM IST
Bhaskar editorial on army interference in Pakistan election

पाकिस्तान में दो हफ्तों के भीतर चुनाव होने वाले हैं और साफ दिख रहा है कि देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को हाशिये पर धकेला जा रहा है और इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ फौज, आईएसआई और मौलवियों के प्रतिष्ठान की पसंदीदा पार्टी है। नवाज़ शरीफ, उनकी बेटी और दामाद को भ्रष्टाचार के मामले में वहां के नेशनल अकाउंटेबल ब्यूरो द्वारा दस साल की सजा सुनाना संयोग की बात नहीं है।

चुनाव के पहले शरीफ को जितना बदनाम किया जा सके, लोगों में उनकी लोकप्रियता को जितना घटाया जा सके उतनी कोशिशें जारी हैं। जाहिर है चुनाव के नतीजे अपने पक्ष में ढालने के जो भी प्रयास हो रहे हैं उसमें शरीफ से ज्यादा पाकिस्तान की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों की लोकप्रियता मुख्य रोड़ा है। प्रतिष्ठान की पूरी कोशिश बंटा हुआ जनादेश लाने की है। संसद यदि बंटी हुई होगी तो उसे अपने हिसाब से चलाना आसान होगा।

पीपीपी के नेता बाबर ने ऐसी आशंका जाहिर भी की है। इसका एक दूसरा पहलू भी है। शरीफ को सजा सुनाए जाने के साथ एक वृत्त पूरा हुआ। अस्सी के दशक में शरीफ ने जिया उल हक की मदद से बेनजीर भुट्‌टो और आसिफ अली जरदारी के खिलाफ मोर्चा खोला था। जरदारी को दस साल जेल की सजा में शरीफ की बड़ी भूमिका थी। तब उन्हें फौज की प्रत्यक्ष व अदालत की परोक्ष मदद मिली थी। लेकिन, मुशर्रफ के साथ पटरी नहीं बैठ पाने और सत्ता से बेदखल होने के बाद शरीफ प्रतिष्ठान के विरुद्ध हो गए। मुशर्रफ के कार्यकाल में तो वे दुबई और पश्चिम एशिया में ही रहे।

कोई आठ साल बाद वे वतन लौटे और दो बार प्रधानमंत्री भी चुने गए। उन्होंने मुशर्रफ के जमाने के फौजी अधिकारियों की जांच शुरू कर दी। इसीलिए फौज उन्हें किसी भी कीमत पर रोकना चाहती है। लेकिन, फौज पिछले कई दशकों से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सत्ता चलाती रही है पर वह कोई पारदर्शी, जनहितैषी शासन ला नहीं पाई। पाकिस्तान के लोग फौज के प्रति भरोसा तो रखते हैं लेकिन, वे देश में फौज का शासन भी नहीं चाहते। उन्हें राजनीति में शरीफ की मौजूदगी लोकतंत्र के ज़िंदा होने का भरोसा देती है। देखिए, इस दोहरी मानसिकता में वे क्या फैसला देते हैं।

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