--Advertisement--

भास्कर संपादकीय: राजग में महाराष्ट्र से बिहार तक तेज हुई खींचतान

इसमें एक प्रकार की सौदेबाजी है तो दूसरी ओर 2019 के लिए सुरक्षित भविष्य की तलाश भी है।

Danik Bhaskar | Jun 06, 2018, 12:55 AM IST
फाइल फोटो। फाइल फोटो।

चार लोकसभा और दस विधानसभा उपचुनावों के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में खलबली मची है। शिवसेना, अकाली दल, जद (यू), लोजपा, रालोसपा और सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी जैसे पुराने और नए सहयोगी दलों ने अपने-अपने ढंग से असंतोष व्यक्ति करना शुरू कर दिया है। इसमें एक प्रकार की सौदेबाजी है तो दूसरी ओर 2019 के लिए सुरक्षित भविष्य की तलाश भी है।

शिवसेना, अकाली दल और जद (यू) को मालूम है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा एक बड़ी ताकत रहेगी ही लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर वे अपनी ताकत क्यों खोएं। वे जानते हैं कि उनका अस्तित्व क्षेत्रीयता और अस्मिताओं पर टिका है। इसलिए जहां जद (यू) ने यह पक्का कर लिया है कि बिहार के स्तर पर गठबंधन का चेहरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहेंगे।

उधर, महाराष्ट्र में बड़े भाई न रह पाने की सबसे गहरी टीस शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे को है। इसी कारण शिवसेना पालघर लोकसभा का उपचुनाव भाजपा के खिलाफ लड़ गई और 2019 में गठबंधन से बाहर होकर लड़ने की धमकी दे रही है। उद्धव को समझाने के लिए बुधवार को अमित शाह मातोश्री में उनसे मिल रहे हैं। देखना है कि अपने सबसे पुराने सहयोगी दल के असंतोष को वे कितना शांत कर पाते हैं। बेचैनी और सौदेबाजी की यह खींचतान पंजाब में भी है और गुरुवार को चंडीगढ़ में अमित शाह के साथ अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल की बैठक है। हालांकि वहां कांग्रेस मुख्य प्रतिद्वंद्वी होने के कारण अकाली दल के गठबंधन छोड़ने का खतरा कम है। उत्तर प्रदेश के तीन लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई हैं।

इसे पीड़ादायक बना दिया है सपा, बसपा, रालोद और कांग्रेस की बढ़ती निकटता ने। इस जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने। जहां जद(यू) के प्रवक्ता केसी त्यागी ने इस हार को गन्ना किसानों की उपेक्षा से जोड़ा है, वहीं राजभर ने दलितों और पिछड़ों की उपेक्षा से। राजग की यह खींचतान स्वाभाविक हो सकती है और रणनीतिक भी। संभव है यह दल अलग चुनाव लड़कर बाद में भाजपा का साथ दें। जो भी हो यह खींचतान नेताओं के स्वार्थ और समाज के यथार्थ का एक रूप है।