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​दिल्ली के दर्जे के मुद्‌दे पर कानून व संविधान की जीत- भास्कर संपादकीय

न्यायालय ने साफ किया- उपराज्यपाल मंत्रिमंडल के फैसले को मानने को बाध्य हैं लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा संभव नही

Dainik Bhaskar

Jul 04, 2018, 11:02 PM IST
सु्प्रीम कोर्ट के इस फैसले की सु्प्रीम कोर्ट के इस फैसले की

दिल्ली के मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच छिड़े घमासान में सुप्रीम कोर्ट ने समुचित न्याय देकर दो पाटों में पिस रही दिल्ली की जनता को राहत दी है। न्यायालय ने यह कहकर दूध का दूध पानी का पानी कर दिया है कि उपराज्यपाल मंत्रिमंडल के फैसले को मानने को बाध्य हैं लेकिन, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना संभव नहीं है, इसलिए पार्टियों को यह मांग छोड़ देनी चाहिए। इस फैसले की यह व्याख्या हो सकती है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उपराज्यपाल अनिल बैजल से लड़ाई जीत ली है लेकिन, हकीकत में इस फैसले में संविधान और कानून का राज जीता है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के नेतृत्व में गठित पांच सदस्यीय खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का दायित्व संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन होता है और इस दौरान किसी प्रकार की अराजकता नहीं पैदा होनी चाहिए। इसीलिए अदालत ने 69वें संविधान संशोधन के माध्यम से लाए गए अनुच्छेद 239 एए की एक मुकम्मल व्याख्या कर दी है, जिसे दिल्ली हाई कोर्ट नहीं कर पाया था। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए साफ कह दिया है कि उपराज्यपाल कोई स्वतंत्र सत्ता के अधिकारी नहीं हैं और वे मंत्रिमंडल के काम में बाधा डालने की बजाय उसके निर्णयों से बंधे हुए हैं। अगर किसी मामले पर मतभेद उत्पन्न होता है तो उसे मिल बैठकर सुलझाना चाहिए और अगर न सुलझे तो राष्ट्रपति की राय सर्वोपरि है।

अदालत द्वारा स्थापित विधि इस मामले में स्पष्ट है कि बेवजह का विवाद उठाकर संविधान का मजाक बनाना उचित नहीं है। निश्चित तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रशासन और विकास केजरीवाल बनाम मोदी और आप बनाम भाजपा की नाक की लड़ाई में ऐसा उलझ गया था कि कोई कामकाज होने की बजाय हर दो चार महीने पर कोई नाटक खड़ा हो जाता था। इससे दिल्ली की जनता की भावनाओं का भी मजाक हो रहा था और संविधान का भी। एक तरह से इन दो नेताओं और दलों के बीच दिल्ली त्रिशंकु होकर रह गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एक सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया है और अनुच्छेद 239 एए की एक रचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत कर दी है। आशा की जानी चाहिए कि राजनीतिक दल अपने अहंकार से ऊपर उठकर संविधान की भावना को समझेंगे और उसका मजाक उड़ाने से बचेंगे।

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