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भास्कर संपादकीय: रोजगार के आंकड़े और नापने के तरीके बदलने का इरादा

बेरोजगारी के आंकड़े सरकारी सर्वेक्षणों और निजी सर्वेक्षणों में अलग-अलग हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Jul 04, 2018, 01:07 AM IST

भास्कर संपादकीय: रोजगार के आंकड़े और नापने के तरीके बदलने का इरादा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार वादे के मुताबिक रोजगार सृजन के मोर्चे पर विफल रही है। यह निष्कर्ष स्वयं उनके उस बयान से प्रमाणित होता है, जिसमें वे कहते हैं कि किसी के पास रोजगार के बारे में सटीक आंकड़े नहीं हैं। उनका दावा है कि रोजगार मापने के पुराने औजार बेकार हो चुके हैं, इसलिए नई अर्थव्यवस्था में रोजगार मापने के दूसरे उपकरण चाहिए। एक इंटरव्यू में उनका यह बयान उस पिछले बयान को मजबूती देता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पकौड़ा बेचना भी तो एक रोजगार है।

भाजपा ने 2014 के चुनाव में हर साल ढाई करोड़ रोजगार सृजित करने का वादा किया था, जबकि हकीकत में हर साल औसतन दो लाख रोजगार ही सृजित हो पा रहे हैं। इसीलिए सरकार रोजगार मापने के औजार वैसे ही बदलना चाहती है, जिस तरह उसने जीडीपी मापने के पैमाने बदलकर भारत की वृद्धि दर दुनिया में सबसे ऊपर होने का प्रदर्शन कर रखा है।

बेरोजगारी के आंकड़े सरकारी सर्वेक्षणों और निजी सर्वेक्षणों में अलग-अलग हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार इस समय देश में 3 करोड़ युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं। सीएमआईई के अनुसार अभी बेरोजगारी की दर 6.1 प्रतिशत आंकी गई है, जो पिछले 15 माह में सबसे ज्यादा है। इससे अलग इकोनॉमिक सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 2013-14 में बेरोजगारी की दर 4.9 फीसदी थी, जो 2016-17 में बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर 3.5 प्रतिशत के करीब रहने वाली है और 2017 से 2019 तक बेरोजगारों की संख्या क्रमशः 1.83 करोड़, 1.86 करोड़ और 1.89 करोड़ रहेगी। बेरोजगारी की इसी स्थिति पर तंज करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस के नेता डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि जिस सरकार ने दस साल में 25 करोड़ यानी हर साल ढाई करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था वह सालाना दो लाख रोजगार भी सृजित नहीं कर पा रही है। हालांकि, नौकरियां सृजित करने का आंकड़ा उत्तरोत्तर बढ़ रहा है और अगर वह 2015 में 1.55 लाख था तो 2017 में 4.16 लाख और 2018 में 6 लाख होने का अनुमान है। फिर भी यह उपलब्धि अपेक्षा से बहुत कम है। सबसे बुरी स्थिति तो ग्रामीण इलाके में है। स्वयं सरकार ने नोटबंदी के माध्यम से रोजगार के पनपते वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाई है। उसके परिणाम भी उसे भोगने पड़ेंगे।

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