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भास्कर संपादकीय: उपचुनाव में ईवीएम की खराबी से संदेह को हवा

भंडारा और गोंदिया से लेकर कैराना और नूरपुर तक आयोग और सरकार पर सांठगांठ के आरोप लगे।

Dainik Bhaskar | Last Modified - May 29, 2018, 11:43 PM IST

भास्कर संपादकीय: उपचुनाव में ईवीएम की खराबी से संदेह को हवा

सोमवार को संपन्न हुए लोकसभा के चार और विधानसभाओं के दस क्षेत्रों के उपचुनाव इतनी प्रतिष्ठा के विषय बन गए हैं कि ईवीएम और वीवीपीएटी में आई खराबी चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एनडीए सरकार की नीयत पर संदेह का मुद्‌दा बन गई। भंडारा और गोंदिया से लेकर कैराना और नूरपुर तक आयोग और सरकार पर सांठगांठ के आरोप लगे। विपक्ष को लगता है कि इसी से विपक्षी एकता का भावी सेतु निर्मित होगा तो सत्तापक्ष को लगता है कि यहीं ध्वस्त करके विपक्ष के 2019 के सपने को चूर किया जा सकता है।

सच्चाई, सेवा और सहनशीलता की बजाय सत्ता, विजय और द्वेष पर आधारित राजनीति में हल्की-सी हरकत संदेह पैदा करती है और मीडिया के हवाई विमर्श उसे बढ़ावा देते हैं। इसी कारण जहां कांग्रेस ने ईवीएम के बिना चुनाव कराने की मांग कर डाली, वहीं अन्य दलों ने भाजपा पर जानबूझकर ऐसा करने का आरोप लगाया। ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत भाजपा ने भी की लेकिन, उसने मशीन की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं उठाया।

इस बिगड़ते माहौल में चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की सबसे ज्यादा चर्चित कैराना सीट के 73 बूथों पर दोबारा मतदान का आदेश देकर स्थिति संभालने का सराहनीय प्रयास किया है। हालांकि, उनका आरंभ में यही कहना था कि ईवीएम में थोड़ी बहुत गड़बड़ी तेज गर्मी और धूल के कारण हुई और उन्हें जल्दी ही ठीक कर लिया गया, जबकि वीवीपीएटी की मशीन को ठीक करने में समय लगा। उनकी दलील थी कि कर्मचारी ईवीएम से अभ्यस्त हैं लेकिन, वीवीपीएटी नई मशीन होने के नाते उसे जल्दी ठीक नहीं कर पाए। निश्चित तौर पर यह चुनाव आयोग की अक्षमता थी जिसके कारण कैराना में रात के बारह बजे तक बूथों पर मतदाताओं की कतार लगी रही और कुछ लोगों ने रोजा इफ्तार बूथ के भीतर ही किया।

रमजान के दौरान मतदान की तारीख तय करके अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव के आरोपों के बावजूद अगर आयोग ने देर रात तक मतदान का इंतजाम किया और बाद में ईवीएम में गड़बड़ी वाले बूथों पर दोबारा मतदान के आदेश दिए तो संदेह करने वालों को शांत हो जाना चाहिए। चुनाव आयोग की कमान हमेशा टीएन शेषन या वीवी लिंगदोह जैसे सख्त प्रशासक के हाथ में नहीं रहती फिर भी लोकतंत्र संस्थागत भरोसे पर कायम रहता है। इसलिए संस्थाओं को बचाकर रखना सत्ता और विपक्ष सभी की जिम्मेदारी है।

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