भास्कर संपादकीय: न्यायिक नियुक्ति में जरूरी है निष्पक्षता का पालन / भास्कर संपादकीय: न्यायिक नियुक्ति में जरूरी है निष्पक्षता का पालन

न्यायिक नियुक्ति में निष्पक्षता और स्वायत्तता का सवाल भारतीय लोकतंत्र को निरंतर बेचैन किए हुए है

Bhaskar News

Aug 01, 2018, 11:08 PM IST
bhaskar editorial on fairness in judicial appointment

न्यायिक नियुक्ति में निष्पक्षता और स्वायत्तता का सवाल भारतीय लोकतंत्र को निरंतर बेचैन किए हुए है और उसे जितना ही सुलझाने का प्रयास किया जाता है वह उतना ही उलझता जाता है। कार्यपालिका और न्यायपालिका के रिश्तों में इतना सौहार्द होना चाहिए कि न्यायपालिका की साख विवादित न हो। सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम से केंद्र सरकार ने शिकायत की है कि उच्च न्यायालयों की ओर से जो नाम भेजे जा रहे हैं उनमें भाई भतीजावाद, जातिवाद तो है ही समाज के वंचित तबके की उपेक्षा भी है।

कॉलेजियम प्रणाली की स्वायत्तता की बहस में यह प्रश्न उठता रहा है कि जिन वकीलों के नाम हाई कोर्ट के जजों के पद के लिए भेजे जाते हैं वे या तो किसी मौजूदा न्यायमूर्ति या फिर किसी सेवानिवृत्त जज के रिश्तेदार होते हैं। इसके अलावा इन नामों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग नगण्य होते हैं। इसी वजह से दो साल पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने एक हाई कोर्ट की ओर से भेजे गए 30 में से 11 नाम ठुकरा दिए थे। उन नामों में जजों और ताकतवर राजनेताओं के रिश्तेदारों के नाम थे। इस बार भी एक हाई कोर्ट से वैसी ही सूची प्राप्त होने पर सरकार ने आपत्ति जताई है, जिसमें एक तिहाई नाम ताकतवर लोगों के रिश्तेदारों के हैं। सवाल है कि क्या कानून और न्याय का व्यवसाय राजनीति, सेना, उद्योग-व्यापार और फिल्मों की तरह ही खानदानी बनकर रह गया है? एक हद तक इसमें एक सच्चाई है। इसलिए समाज के वंचित हिस्सों को प्रवेश दिलाने के लिए उच्च न्यायिक पदों पर आरक्षण की मांग भी उठती रही है। इस दौरान न्यायिक निर्णयों पर जातिवादी होने का आरोप लगाते हुए जजों के विरुद्ध कैबिनेट तक की टिप्पणियां आती हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

हाल में न्यायमूर्ति एके गोयल को राष्ट्रीय हरित पंचाट का प्रमुख बनाए जाने पर केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और रामदास आठवले ने इस आधार पर विरोध जताया था कि उन्होंने अजा और अजजा कानून को कमजोर किया था। ऐसे में फिर वही सवाल उठता है कि न्यायिक नियुक्ति का सवाल जजों के कॉलेजियम के पास छोड़ा जाए या राजनेताओं द्वारा संचालित कार्यपालिका पर। खतरा दोनों तरफ है। इसलिए उसे लोकतंत्र और संविधान के अंतःकरण पर छोड़ना उचित होगा और जिम्मेदार लोगों को उसे जगाए रखने की अपील करनी होगी।

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