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महाभियोग की नौबत नहीं आती तो बेहतर होता

विपक्षी दलों ने कहा भी है कि उनके पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

Danik Bhaskar | Apr 21, 2018, 07:09 AM IST

देश के सात विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के विरुद्ध उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को महाभियोग का नोटिस देकर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा कर दी है। विपक्ष ने उनके विरुद्ध पांच आरोप लगाए हैं। यह स्थिति संविधान और उसकी संस्थाओं के प्रति गहराते अविश्वास को और बढ़ाएगी, क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व के विचाधारात्मक पक्षपात से दुखी लोग न्यायपालिका को ही अंतिम विकल्प मानकर चलते हैं। अब अगर उसकी छवि पर खुले आम राजनीतिक बहसों और आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा तो इससे भारतीय लोकतंत्र की घरेलू और विदेशी छवि की और छीछालेदर होगी। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट जनरल से यह इच्छा भी व्यक्त की है कि इस मामले को मीडिया रिपोर्ट न करे। विपक्षी दलों ने कहा भी है कि उनके पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

महाभियोग के पीछे तात्कालिक वजह तो सीबीआई के विशेष जज बृजगोपाल हरिकिशन लोया की मौत की जांच की याचिका का खारिज किया जाना है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने न सिर्फ उस याचिका को खारिज किया है बल्कि जनहित याचिका करने वालों को फटकारते हुए कठोर टिप्पणियां भी की हैं।

अदालत चाहती है कि राजनीतिक विवाद को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मंच का इस्तेमाल न किया जाए, क्योंकि उसके लिए संसद जैसी संस्था है। ऐसा कहते हुए न्यायपालिका यह भूल गई कि सोहराबुद्‌दीन की मुठभेड़ में मौत का मामला भारतीय विधिशास्त्र को चुनौती दे रहा है। ताकतवर लोगों के दबावों के चलते इस मामले में इंसाफ नहीं मिल पा रहा है। इसलिए अगर सुप्रीम कोर्ट जज लोया की मृत्यु को संदेहास्पद मानता तो गंभीर किस्म का टकराव पैदा होता लेकिन, अदालत ने याचिका को खारिज करके अपने को संदेह के दायरे में ला दिया है।

मक्का मस्जिद मामले के आरोपी असीमानंद से लेकर नरोदा पाटिया मामले में सजा पा चुकी माया कोडनानी का छूटना देश के मानस में कई सवाल खड़े करता है। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर और पूर्व न्यायमूर्ति अभय एम थिम्से अपने बयानों से उन सवालों को गंभीर रूप दे चुके हैं। महाभियोग स्वीकार हो या पराजित हो यह बाद की बात है लेकिन, यह नौबत ही लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।