संपादकीय

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भास्कर संपादकीय: अभी और उथल-पुथल मचेगी पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में

अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध और ईरान पर पाबंदी से जो हालात बन रहे हैं, वे तेल बाजार की ज्वलनशीलता बढ़ाने वाले हैं

Danik Bhaskar

Jul 07, 2018, 12:03 AM IST

अंतरराष्ट्रीय स्थितियों ने भारतीय तेल कंपनियों को फिर तेल के दाम बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है। अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध और ईरान पर लगाई गई अमेरिकी पाबंदी से जो हालात बन रहे हैं वे तेल के बाजार की ज्वलनशीलता बढ़ाने वाले हैं। भारतीय कंपनियों ने 26 जून में कटौती के बाद आठ दिनों तक तेल के दामों में संशोधन रोक रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि अमेरिकी सबक के बाद ओपेक के देश जुलाई में दस लाख बैरल का अतिरिक्त उत्पादन करेंगे।

इस उम्मीद को ईरान की आपूर्ति पर लगाई गई पाबंदी ने निराशा में बदल दिया और गुरुवार को भारत में पेट्रोल के दाम 16 पैसे और डीज़ल के दाम 12 पैसे प्रति लीटर की दर से बढ़ा दिए गए। इसका अर्थ यह है कि ईरान के नुकसान की भरपाई के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सऊदी अरब व दूसरे देशों से जो मदद ले रहे हैं वह भारत ही नहीं दुनिया के लिए नाकाफी है। 4 नवंबर से ईरानी तेल पर लागू होने जा रही पूर्ण पाबंदी को देखते हुए ही ईरान ने कच्चे तेल के दाम 100 रुपए प्रति बैरल होने की आशंका जताई है। ईरान ने हार्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले तेल जहाजों को रोकने की तो अमेरिका ने हस्तक्षेप की धमकी डे डाली है। ईरान रोजाना 23 लाख बैरल से 25 लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है उसकी भरपाई ओपेक के सिर्फ दस लाख बैरल के अतिरिक्त उत्पादन से कैसे हो पाएगी यह भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए सोचने का विषय है।

भारत में तेल के दाम बढ़ने के पीछे डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत भी जिम्मेदार है। शुक्रवार को रुपया 68.95 पर पहुंच गया है। ट्रम्प के व्यवहार को देखते हुए यह आशंका भी जताई जा रही है कि डॉलर 80 रुपए तक जा सकता है। भारत की दिक्कत यह है कि चीन-अमेरिका के व्यापार युद्ध में सीधी भागीदारी न करने के बावजूद वह उसके प्रभाव से बच नहीं सकता। इस बीच भारत के कई राज्यों में चुनाव के बाद अगले साल देश का आम चुनाव भी होने जा रहा है। उन परिस्थितियों में सरकार को तेल के दामों की ज्वलनशीलता को काबू में रखना होगा। तेल के राजनीतिक अर्थशास्त्र से बचकर निकलना तो किसी देश के लिए संभव नहीं है लेकिन, अगर हमें भारतीय लोकतंत्र को खाड़ी की राजनीतिक लपटों से बचाना है तो तेल पर ज्यादा कर उगाही का लालच छोड़ने के साथ ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी।

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