संपादकीय

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भास्कर संपादकीय: तेल की कीमतों पर भारत बंद और सरकार की दुविधा

तेल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों पर विपक्षी दलों के भारत बंद ने सरकार को संदेश दे दिया कि यह गंभीर मामला है

Danik Bhaskar

Sep 11, 2018, 12:07 AM IST

तेल की बेतहाशा बढ़ती कीमतों पर 22 विपक्षी दलों के भारत बंद ने सरकार को यह संदेश दे दिया है कि यह आर्थिक और राजनीतिक रूप से गंभीर मामला है और इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। बंद के दौरान कांग्रेस और वाममोर्चा के साथ खड़े हुए विभिन्न दलों की विपक्षी एकता ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लगाए गए उस आरोप का भी जवाब दे दिया है कि विपक्ष के पास न कोई नेता है, न कोई नीति और न कोई रणनीति।

हालांकि, इस बंद में सभी विपक्षी दलों के नेता उस उत्साह से नहीं दिखे जिसकी अपेक्षा थी। अगर पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस ने बंद के मुद्‌दों का समर्थन किया है तो उसमें राजनीतिक भागीदारी से अपने को अलग रखा है। उत्तर प्रदेश में बंद का समर्थन करने वाली समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी के नेता आयोजनों से दूर रहे। दिल्ली में जरूर राजघाट, जंतर मंतर और रामलीला मैदान पर विपक्षी दलों के नेताओं का जमावड़ा दिखा और उसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने सरकार पर कड़ा प्रहार किया। राहुल गांधी ने तंज कसते हुए कहा कि वे सही कहते हैं कि जो काम कांग्रेस ने सत्तर सालों में नहीं किया वह काम उन्होंने 48 महीनों में कर दिया। इसी आक्रामकता के जवाब में विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विपक्ष पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया। यहां केंद्रीय मंत्री की यह बात महत्वपूर्ण है कि तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय ताकतों व्दारा संचालित हो रहे हैं, उनका उत्पादन कम हो रहा है इसलिए सरकार उसमें कुछ कर नहीं सकती।

पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान यूपीए सरकार पर तेल के बॉन्ड जारी करके उनके दामों को नियंत्रित करने और आज उसी का खामियाजा भुगतने का आरोप लगा ही रहे हैं। इस बहस के बीच यह स्मरणीय है कि यूपीए ने तेल के दाम उस समय काबू में रखे थे जब वह इंडियन बॉस्केट में 132 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया था। आज जब तेल के दाम 77 डॉलर प्रति बैरल हैं तो सरकार उन्हें बढ़ने दे रही है। इसमें केंद्र और राज्य सरकार के करों का योगदान है और सरकार उन्हें वापस करने को तैयार नहीं है। सरकार की दुविधा यह है कि वह पेट्रोल डीजल को जीएसटी में लाती है तो करों की आमदनी घटेगी और वह कल्याण योजनाएं नहीं चला पाएगी। नहीं लाती है तो बढ़ती महंगाई न सिर्फ अर्थव्यवस्था पर बल्कि आगामी चुनाव में भी भारी पड़ेगी।

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