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भास्कर संपादकीय: भारत-अमेरिका रक्षा संबंधी संचार समझौते का मतलब

आज के युग में जमीन-जायदाद और हथियार से भी ज्यादा मूल्यवान चीज है डेटा

Danik Bhaskar | Sep 08, 2018, 12:27 AM IST

भारत और अमेरिका ने गुरुवार को कामकासा (कम्युनिकेशन्स कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर दस्तखत करते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग के नए द्वार खोल दिए हैं। आज के युग में जमीन-जायदाद और हथियार से भी ज्यादा मूल्यवान चीज है डेटा। यह समझौता तमाम तरह के डेटा की भागीदारी के लिए भारत को अमेरिकी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की इजाजत देगा। इसके साथ ही भारत उन डेटा का भी इस्तेमाल कर सकेगा, जिन्हें दूसरे देशों की सेनाएं अमेरिका से साझा करती हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक आर. पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जेम्स एन. मैटिस के साथ भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने उस पर दस्तखत किए और न सिर्फ सरकारी स्तर पर डेटा की हिस्सेदारी के द्वार खोले बल्कि निजी स्तर पर भी रक्षा में काम करने वाली कंपनियों के लिए भी यह संभावना तैयार की। समझौते का उद्‌देश्य दुनिया भर में फैले अमेरिकी रक्षा नेटवर्क के साथ भारत का सहयोग और आतंकवादी गतिविधियों पर निगरानी रखना भी है। भारत ने रक्षा मामलों में निजी कंपनियों को निर्माण का मौका हाल में दिया है और इस समझौते से उस नीति को मजबूती मिलेगी।

अब भारत की निजी कंपनियां अमेरिका की सैन्य आपूर्ति शृंखला में शामिल हो सकेंगी। भारत इस बात से खुश है कि अमेरिका पाकिस्तान में पैदा हो रहे आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय है और इसीलिए उसने दक्षिण एशिया में ट्रम्प की नीति का समर्थन किया है। हालांकि, इस समर्थन से अलग भारत को ईरान पर लगी पाबंदी का पालन करने में अपना नुकसान दिखाई पड़ रहा है। यही कारण है कि भारत ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से अनुरोध किया है कि वे इस बात का ध्यान रखे कि ईरान पर पाबंदी से भारत को नुकसान न हो। जबकि अमेरिका ईरान पर पाबंदी लगाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।

आर्थिक और सामरिक हितों के इस लेन-देन के बीच भारत को अमेरिकी निकटता से रक्षा और संचार संबंधी तकनीक का अगर लाभ मिलेगा तो तेल-गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों को महंगी कीमत पर खरीदने को बाध्य होना पड़ेगा। रक्षा का बड़ा दारोमदार संचार की नई तकनीक पर निर्भर है और अमेरिका वह भारत से साझा करने को तैयार है लेकिन, वह ईरान के साथ कोई नरमी बरतने को तैयार नहीं है। भारत इन दोनों के बीच संतुलन बिठाने का प्रयास करना होगा।