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भास्कर संपादकीय: संघर्ष विराम के बीच हुर्रियत से बातचीत का प्रस्ताव

संघर्षविराम के लिए अलगाववादियों से वार्ता के प्रस्ताव के पीछे पर्याप्त मेहनत की कमी लगती है।

Danik Bhaskar | May 30, 2018, 11:54 PM IST
2017 में भी पाकिस्तान ने 860 बार संघ 2017 में भी पाकिस्तान ने 860 बार संघ

पाकिस्तान के आक्रामक रुख के प्रति भारत के मुंहतोड़ जवाब और राजनयिक प्रयासों का नतीजा है कि दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन्स ने 2003 के संघर्षविराम समझौते को उसकी पूरी भावना में लागू करने का एलान किया है। इस बीच भारत सरकार ने कश्मीर के अलगाववादियों से भी बातचीत का प्रस्ताव रखा है। स्पष्ट तौर पर संघर्षविराम के लिए राजनयिक स्तर पर ज्यादा मेहनत की गई है और उस पर दोनों तरफ से साफ घोषणाएं हुई हैं, जबकि अलगाववादियों से वार्ता के प्रस्ताव के पीछे पर्याप्त मेहनत की कमी लगती है।

अलगाववादियों की ओर से यह कहना कि सरकार की वार्ता का खाका स्पष्ट नहीं है, दर्शाता है कि उनसे संपर्क करने वाले मध्यस्थ या तो सभी बात बताने के लिए अधिकृत नहीं थे या फिर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और विदेश मंत्री के बयानों में अंतर होने के कारण भ्रम कायम है। सैयद अली शाह गिलानी, मौलवी मीर वाइज और यासिन मलिक का कहना है कि प्रधानमंत्री विकास में कश्मीर समस्या का समाधान देखते हैं तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि आतंकवाद और वार्ता दोनों एक साथ संभव नहीं है।

उधर गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि पाकिस्तान और कश्मीर से वार्ता हो पर यह ध्यान रखते हुए कश्मीर और कश्मीरी हमारे हैं। इसके बाद भी हुर्रियत नेताओं ने वार्ता के प्रस्ताव का स्वागत किया है पर पाकिस्तान को एक पक्ष बताते हुए उसे भी शामिल करने की मांग की है। सरकार को चाहिए कि वह अलगाववादियों को विश्वास में लेकर वार्ता की मेज तक लाए ताकि वार्ता के प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज करने वाले लश्कर-ए-तय्यबा और हिजबुल मुजाहिदीन और अलग-थलग पड़ जाएं।

इस माहौल को निर्मित करने में वास्तविक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर संघर्षविराम का असर पड़ेगा, क्योंकि पाकिस्तान से जारी तनाव के कारण 2016 से वार्ता रुकी है। पिछले डेढ़ वर्षों में संघर्षविराम उल्लंघन की तकरीबन दो हजार घटनाएं होने का अनुमान है, जिसमें सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान पाकिस्तान का भारी नुकसान हुआ है। संघर्षविराम को लागू करवाने के पीछे भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और पाकिस्तानी एनएसए नसीर खान जंजुआ का कठिन प्रयास बताया जाता है। अब जरूरत इससे आगे बढ़ने की है।