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मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक चर्चा के मायने

संदेश यह है कि भारत ने स्वीकार कर लिया है कि वह चीन के साथ कड़ाई से पेश आकर कुछ हासिल नहीं कर सकता।

Bhaskar News | Last Modified - Apr 28, 2018, 03:39 AM IST

मोदी और शी जिनपिंग की अनौपचारिक चर्चा के मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय चीन दौरे में अनौपचारिकता के शिष्टाचार में व्यावहारिक राजनय का तत्व छुपा हुआ है। इसलिए अगर हम ‘पहली बार मोदी’ के जुमले से हटकर इसका विश्लेषण करेंगे तो ज्यादा बातें समझ में आएंगी। अगर चीन में माओ त्से तुंग के बाद उभरे सबसे शक्तिशाली नेता शी जिनपिंग मोदी के साथ राजधानी बीजिंग की बजाय हुबेई प्रांत की राजधानी बुहान में मुलाकात कर रहे हैं तो इसमें भारत को विशेष दर्जा नहीं विशेष सुविधा और सद्‌भावना प्रदान करने का भाव है। जब भी अनौपचारिक बैठकें होती हैं तो उन पर मीडिया और अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों की निगाहें वैसी नहीं गड़ी होतीं जैसी कि औपचारिक बैठकों पर।

अनौपचारिक बैठकों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की मजबूरी भी नहीं जुड़ी होती और अनौपचारिक बैठक के माध्यम से आगे की औपचारिक बैठक की बेहतर तैयारी की जा सकती है। संदेश यह है कि भारत ने स्वीकार कर लिया है कि वह चीन के साथ कड़ाई से पेश आकर कुछ हासिल नहीं कर सकता। उसे चीन के पास छोटा भाई बनकर ही जाना होगा और उस रिश्ते के लिए चीन ने भी गुंजाइश पैदा की है। प्रधानमंत्री मोदी की आक्रामक विदेश नीति का बहुत उत्साहवर्धक परिणाम हासिल नहीं हो सका है।

मोदी इससे पहले तीन बार चीन का दौरा कर चुके हैं और 11 बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शी से मिल चुके हैं। शी ने भी भारत का दौरा किया था और उनके स्वागत में मोदी ने पलक पांवड़े बिछा दिए थे। इसके बावजूद चीन डोकलाम में 73 दिनों तक जमा बैठा रहा। चीन ने न तो ‘न्यूक्लीयर सप्लायर्स ग्रुप’ में भारत को सदस्यता दिए जाने का समर्थन किया और न ही मसूद अजहर को आतंकी मानने को तैयार हुआ। उसकी ‘वन बेल्ट वन रोड’ की योजना भी कश्मीर से गुजरती हुई भारत की सम्प्रभुता को चुनौती दे रही है।

इन सारे अनुभवों से सीख लेते हुए मोदी और शी ने जो अनौपचारिक पहल की है उसके पीछे काफी औपचारिक मेहनत की गई है। जून के महीने में दोनों नेताओं के बीच शंघाई सहयोग संगठन की शिखर वार्ता में भी भेंट होनी ह। उम्मीद की जानी चाहिए कि शी और मोदी की यह मुलाकात 1988 में ली पेंग के आमंत्रण पर हुई राजीव गांधी के चीन दौरे और उनकी तंग श्याओ फिंग से मुलाकात जैसी सार्थक ही नहीं उसे और आगे बढ़ाने वाली होगी।

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