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कर्नाटक में फिर सुनाई दिए राजनीति के कड़वे बोल

राहुल का कहना है कि मोदी के पास कर्नाटक सरकार के काम के बारे में बोलने को कुछ नहीं है, इसलिए वे निजी हमले कर रहे हैं।

Dainik Bhaskar

May 05, 2018, 01:41 AM IST
bhaskar editorial on karnataka election politics

राजनीति में प्रतिद्वंद्वी के बारे में कड़वी बातें अपने कार्यकर्ताओं को मीठी लगती हैं और जनता के मन में विरोधी के प्रति संशय पैदा करती हैं। यही कारण है कि कर्नाटक चुनाव में एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस के शब्दबाण बरस रहे हैं। अगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेरी बात पंद्रह मिनट नहीं झेल सकते तो उनके जवाब में मोदी कह रहे हैं कि राहुल किसी भी भाषा में परचा देखे बिना पंद्रह मिनट नहीं बोल सकते।

राहुल का कहना है कि मोदी के पास कर्नाटक सरकार के काम के बारे में बोलने को कुछ नहीं है, इसलिए वे निजी हमले कर रहे हैं। शायद राहुल गांधी मोदी की शब्दों पर फंसाने वाली रणनीति को लेकर चौकन्ने हैं इसीलिए दूध के जले राहुल प्रधानमंत्री के कड़वे बयानों पर तो चुप हैं ही हल्के बयानों को भी फूंक मारकर पी रहे हैं। उन्हें मालूम है कि पिछली बार गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मणिशंकर अय्यर की एक टिप्पणी और कपिल सिब्बल की अदालत की एक दलील कांग्रेस के लिए भारी पड़ी थी। इन सबके बावजूद राहुल यह कहने से नहीं झिझक रहे हैं कि कर्नाटक में भाजपा ने ‘गब्बर सिंह का गैंग’ तैनात कर रखी है।

यह सही है कि चुनावों की भाषा और सामान्य जन के संवाद में काफी अंतर होता है और आमतौर पर चुनाव को नाटक ही माना जाता है। इसके बावजूद इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव समाप्त होने के बाद कड़वी बातों का असर सामाजिक संबंधों पर पड़ता है। स्वयं प्रधानमंत्री ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि बार-बार होने वाले विधानसभाओं के चुनाव के कारण समाज में कटुता बढ़ती है। इसलिए उन्होंने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की पैरवी भी की थी।

इस स्वीकारोक्ति के बावजूद मोदी प्रधानमंत्री जैसे बड़े ओहदे से ऐसी भाषा की पहल नहीं करते जो सौम्य और मधुर हो। वे अगर कहते हैं कि सिद्धारमैया सरकार ने बैंगलुरू को ‘साइबर सिटी’ से ‘सिटी ऑफ सिन’ बना दिया है तो यह बयान वैश्विक स्तर तक चुभने वाला है। प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति और मीडिया के लिए कड़वी जुबान और उस पर तीखी प्रतिक्रियाएं मार्केट स्ट्रैटजी हो सकती हैं, लेकिन इससे समाज के दिलों में जो जख्म बनता है वह सामाजिक त्रासदी पैदा करता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि मुद्‌दे गायब हो जाते हैं और विद्वेष के लिए सनसनी शेष रह जाती है।

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