भास्कर संपादकीय: उत्पात की नहीं, प्रेम व भक्ति की कांवड़ उठाकर चलें / भास्कर संपादकीय: उत्पात की नहीं, प्रेम व भक्ति की कांवड़ उठाकर चलें

कांवड़ यात्रा के कारण बाधा को नागरिकों ने सामान्य घटना मानकर सह लेना मुनासिब समझा

Bhaskar News

Aug 10, 2018, 11:16 PM IST
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सावन के महीने में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्तिभाव से होने वाली कांवड़ यात्रा जैसे-जैसे विस्तार पा रही है वैसे-वैसे उसके साथ उत्पात और हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यहीं पर राज्य नामक संस्था से अतिरिक्त चौकसी की मांग होती है और दुर्भाग्य से जब वह कानून का राज कायम करने वाली संस्था के तौर पर काम करने की बजाय धार्मिक राज कायम करने वाले या मूक दर्शक रहने वाले बल का आचरण करने लगती है तब समस्या उत्पन्न होती है।

कांवड़ यात्रा के कारण बाधा को नागरिकों ने सामान्य घटना मानकर सह लेना मुनासिब समझा है। समस्या तब होती है जब कांवड़ यात्रियों की ओर से हिंसा और उत्पात किया जाता है और पुलिस हाथ पर हाथ धरे खड़ी रहती है। आधुनिक राज्य और लोकतंत्र के सारे मूल्य उस समय धरे रह जाते हैं, जब कांवड़ियों की यात्रा को निष्कंटक बनाने के लिए पुलिस द्वारा अच्छे आचरण का बांड भराया जाता है। उत्तर प्रदेश में हुई ऐसी तीन घटनाएं विशेष रूप से चर्चित रहीं जहां धर्म और राजनीति दोनों का कमजोर चरित्र उजागर हुआ है। एक तो बुलंदशहर जिले में कांवड़ियों ने किसी मामूली बात पर पुलिस की जीप को आग लगा दी और पुलिस डरी हुई खड़ी रही। दूसरी घटना बरेली जिले में हुई जहां पुलिस ने अल्पसंख्यक समुदाय से अच्छे चरित्र का बांड भरवाया और उसमें से तमाम लोग अपना घर खाली करके चले गए। तीसरी घटना दिल्ली के मोती नगर की है जहां किसी कार के कांवड़िए को स्पर्श करते ही धार्मिक यात्रियों ने उसे न सिर्फ तोड़ा बल्कि पलट दिया। विडंबना है कि पुलिस निष्क्रिय रही।

भारत में पौराणिक तौर पर कांवड़ यात्रा की दो परम्पराएं हैं। एक है रावण की और दूसरी है राम की परम्परा। रावण ने शिव को प्रसन्न करके उनकी शक्तियों को पाकर आसुरी कार्य किया और राम ने उन्हीं शक्तियों को लेकर रामराज्य कायम किया। कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा करने वाली राजनीति और उसे संचालित करने वाले समाज को सोचना होगा कि वे कांवड़ यात्रा की मर्यादा पुरुषोत्तम राम की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं या मानवता के विनाशक रावण की परम्परा को। कांवड़ यात्रा का उद्‌देश्य प्रकृति से मानवीय छेड़छाड़ से रुष्ट शिव से माफी मांगते हुए प्रकृति और समस्त जीव जंतुओं का सम्मान करना होता है। इसमें उत्पात करने वाले सत्यम, शिवम, सुंदरम जैसे श्रेष्ठ मूल्य पर टिकी संस्कृति को नष्ट ही करेंगे।

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