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मक्का मस्जिद विस्फोट के फैसले का दूरगामी असर

उन सभी मुकदमों के आरोपी बरी होंगे जिनमें ‘भगवा आतंकवाद’ का राजनीतिक कोण होने का संदेह व्यक्त किया गया था।

Bhaskar News | Last Modified - Apr 16, 2018, 11:11 PM IST

हैदराबाद की मक्का मस्जिद में 18 मई 2007 को हुए पाइप बम विस्फोट के फैसले में सभी आरोपियों के बरी होने का दूरगामी असर होगा और उम्मीद है कि उन सभी मुकदमों के आरोपी बरी होंगे जिनमें ‘भगवा आतंकवाद’ का राजनीतिक कोण होने का संदेह व्यक्त किया गया था।

इस मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी दस (एक मृत) आरोपियों के बरी होने के बाद पुलिस, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), एंटी टेररिस्ट स्क्वाड (एटीएस) और नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) समेत हमारी न्याय प्रणाली पर या तो बहुत विश्वास बढ़ेगा या उन पर गहरा अविश्वास पैदा होगा। निश्चित तौर पर इस फैसले पर अभी विधिशास्त्र के लिहाज से कुछ भी कहने में जल्दबाजी होगी लेकिन, जब भी विधिशास्त्र इस पर गंभीरता से विचार करेगा तो बहुत कुछ रोचक और सैद्धांतिक विमर्श निकलेगा।

इस फैसले को सकारात्मक रूप में लिया जाए या नकारात्मक रूप में यह तब तक स्पष्ट नहीं होगा जब तक मक्का मस्जिद विस्फोट के बारे में सारे तथ्य सामने नहीं आ जाते। मक्का मस्जिद के विस्फोट के मामले में हमारी जांच एजेंसियां यूपीए सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से निकले अभिनव भारत जैसे संगठन पर संदेह कर रही थीं। वे ही एजेंसियां एनडीए का शासन आते ही उसमें सिमी, लश्कर-ए-तय्यबा, हरकत अल जिहाद अल इस्लामी जैसे विदेशी आतंकी गुटों का हाथ देखने लगीं। यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने अगस्त 2010 में राज्य पुलिस के प्रमुखों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें सिर्फ ‘इस्लामी आतंकवाद’ पर ही नहीं ध्यान देना चाहिए बल्कि ‘भगवा आतंकवाद’ पर भी संदेह करना चाहिए।

हिंदू संगठनों का आरोप था कि यह पाकिस्तान को फायदा पहुंचाने वाला सिद्धांत है और अपने ही सेना, पुलिस और अन्य जिम्मेदार विभागों के अधिकारियों पर संदेह करता है। अब मक्का मस्जिद के फैसले की रोशनी में देखें तो लगता है कि कांग्रेस का वह सिद्धांत झूठा था और ऐसे सभी मामलों में आरोपियों को बरी होने से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन अगर तमाम गतिविधियों के लिहाज से देखें तो लगता है कि राजनीतिक बहसों में कानून और न्याय का सच कहीं दब कर रह गया है।

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