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भास्कर संपादकीय: मिली-जुली हैं मोदी सरकार की चार साल की उपलब्धियां

व्यापार करने लायक स्थितियां बनने से भी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग संस्थाओं ने भारत की श्रेणी उन्नत की है।

Danik Bhaskar | May 25, 2018, 11:44 PM IST

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार की चार साल की उपलब्धियां मिली-जुली ही कही जाएंगी। इस सरकार ने जीएसटी समेत सौ प्रतिशत तक निवेश बढ़ाने और श्रम सुधार करने के कई कदम बिना विरोध के उठा लिए और उनका लाभ देश के उद्योग और निर्माण क्षेत्र को हुआ। उतार-चढ़ाव के बावजूद जीडीपी की विकास दर 7.2 प्रतिशत के करीब बनी हुई है, जो दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के टक्कर की मानी जाएगी। देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी पिछले चार वर्षों में 35 प्रतिशत की वृद्धि मजबूत बुनियाद की आश्वस्ति है। आज देश में 417 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है जो सरकार को यह भरोसा देता है कि वह तेल के बढ़ते दामों का मुकाबला कर लेगी। व्यापार करने लायक स्थितियां बनने से भी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग संस्थाओं ने भारत की श्रेणी उन्नत की है।

मुद्रास्फीति की दर को चार और पांच प्रतिशत के बीच रख पाना भी उपलब्धि है। लेकिन तेल के बढ़ते दामों के साथ रुपए का गिरता मूल्य सभी के लिए चिंता का विषय है। रुपया पिछले कुछ दिनों में डॉलर के मुकाबले दस रुपए तक गिरा है। सरकार की नाकामियों में बट्‌टा खाते का कर्ज बड़ी चिंता है। 2014 में एनपीए 2.4 लाख करोड़ रुपए था, जो अब 7.8 लाख करोड़ रुपए तक हो चुका है। राजग सरकार वादे के मुताबिक दो करोड़ रोजगार सालाना सृजित नहीं कर पाई है और न ही विदेशी बैंकों में जमा काला धन देश में ला पाई है।

उधर आक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक देश में बढ़ती आर्थिक असमानता राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता को डांवाडोल करने के लिए काफी है। 2017 में देश में पैदा होने वाली संपत्ति का 73 प्रतिशत हिस्सा एक प्रतिशत लोगों ने हथिया लिया। इसीलिए पिछले चार वर्षों में कभी हरियाणा में आरक्षण के लिए भयानक दंगे हुए तो महाराष्ट्र में मराठा और दलित समुदाय आमने-सामने आ गए।

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलित हुए तो तमिलनाडु के किसानों ने भी दिल्ली तक जबरदस्त प्रदर्शन किया। कश्मीर में भी सरकार को अशांति ही हाथ लगी है। इसीलिए सीएसडीएस के ताजा सर्वे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दोनों को पसंद करने वाले 43 प्रतिशत हो गए हैं। बढ़ते असंतोष के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने राजनीतिक संवाद और सक्रियता से राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक विकल्पहीनता जरूर पैदा की है और उन्हें उसी का भरोसा है।