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भास्कर संपादकीय: संत कबीर की चेतना छूने वाली मोदी की राजनीति

कबीर भले सवा छह सौ साल पहले हुए थे लेकिन, उनके संदेश आगे की सदियों के लिए प्रासंगिक हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Jun 29, 2018, 07:23 AM IST

भास्कर संपादकीय: संत कबीर की चेतना छूने वाली मोदी की राजनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने संत कबीर की 620वीं जयंती और पंचशती परिनिर्वाण दिवस के मौके पर मगहर जैसे उपेक्षित तीर्थ पर संत कबीर अकादमी का शिलान्यास करके समाज में कबीर के संदेशों की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। कबीर भले सवा छह सौ साल पहले हुए थे लेकिन, उनके संदेश आगे की सदियों के लिए प्रासंगिक हैं।

भारतीय समाज को जातिगत और साम्प्रदायिक भेदभाव से मुक्त कराने के लिए भक्तिकाल के संत कवियों का प्रयास भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रतिरोध था। आज़ादी के सत्तर साल बाद भी जाति और सम्प्रदाय के नाम पर बढ़ते विद्वेष को देखते हुए लगता है कि हमें कबीर के भावनात्मक और आध्यात्मिक उपायों की भी उतनी ही जरूरत है, जितनी तार्किक, कानूनी और संस्थागत उपायों की।

यह अच्छी बात है कि भाजपा अपने ओजस्वी वक्ता नरेंद्र मोदी के माध्यम से इन दोनों प्रकार के उपायों का समन्वय कायम कर रही है और गरीब, दलित, पीड़ित, महिला और नौजवानों को सशक्त बनाने के लिए कबीर के दर्शन को साकार करने का संकल्प कर रही है। प्रधानमंत्री ने कबीर के माध्यम से अहंकार के विसर्जन और समभाव व सद्‌भाव का संदेश भी देना चाहा है। कबीर की चेतना को स्पर्श करके राजनीति अपना स्तर उठाए और काशी को छोड़कर मगहर की ओर जाए यह अच्छी बात है।

शायद यही सच्चा समाजवाद और बहुजनवाद भी है लेकिन, कबीर को अगला चुनाव जीतने का हथकंडा बनाया जाए यह संकीर्णता है। कबीर न तो किसी एक धर्म के हैं और न ही किसी एक पार्टी के। वे किसी एक इलाके और देश के भी नहीं हैं। वे पूरी मानवता के हैं। उनमें जातिगत भेदभाव का विरोध जितना है उतना ही विरोध सम्प्रदायवाद का भी है। सबसे बड़ी बात यह कि उनकी कथनी और करनी में भेद नहीं है।

वे पंडित और मुल्ला सभी पर समान रूप से हमला करते हुए कहते हैं कि अरे इन दोऊ ने राह न पाई। यह सवाल सत्ता और विपक्ष दोनों से पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने सच्ची राह पा ली है? कबीर मानवीय प्रेम के प्रेरणा पुरुष हैं पर उनके प्रेम का मार्ग कठिन है। वह खाला का घर नहीं है, जहां हर कोई पहुंच जाए। वहां जाने के लिए अपना शीष उतारकर हाथ पर धरना पड़ता है। क्या दूसरे का शीष उतारने को आतुर राजनीति वैसा कर पाएगी?

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