Hindi News »Abhivyakti »Editorial» Bhaskar Editorial On Nipah Prevention

भास्कर संपादकीय: निपाह की रोकथाम के साथ इलाज ढूंढ़ना भी आवश्यक

बर्ल्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू की तरह ही निपाह वायरस अचानक प्रकट और गायब हो जाने वाली बीमारी है।

Bhaskar News | Last Modified - May 23, 2018, 06:33 AM IST

भास्कर संपादकीय: निपाह की रोकथाम के साथ इलाज ढूंढ़ना भी आवश्यक

पश्चिम बंगाल के 17 साल बाद केरल में होने वाला निपाह वायरस का खौफ यह बताता है कि हम समय समय पर प्रकट और गायब होने वाली बीमारियों के बारे में कितने लापरवाह हैं। कोझीकोड में तकरीबन नौ लोगों की मौत और 25 लोगों के चपेट में आने के बाद राज्य से केंद्र तक स्वास्थ्य सेवाएं चौकस कर दी गई हैं लेकिन, फलों के पेड़ों पर रहने वाले चमगादड़ों से फैलने वाली इस बीमारी से निपटने की अभी तक कोई वैक्सीन नहीं है। सिर्फ रोकथाम ही इसका उपाय है। इसलिए नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल, इंटीग्रेटेड डिज़ीज़ सर्विलेंस प्रोग्राम, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलाजी से लेकर केरल के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जो भी हस्तक्षेप किया जा रहा है वे सब दूसरी बीमारियों की जानकारियों के आधार पर होने वाले सामान्य हस्तक्षेप हैं। इन संस्थाओं के पास विशिष्ट वैज्ञानिक जानकारी और इलाज का अभाव है।

बुखार, सिरदर्द, सुस्ती व सांस की तकलीफ पैदा करने वाली इस बीमारी में इलाज की देरी जानलेवा है। यह सब ऐसी बीमारियां हैं जो प्रकृति और मनुष्य के जटिल रिश्तों के बीच एक प्रकार का विचलन हैं। वे समय-समय पर यह साबित करने के लिए प्रकट होती हैं कि मनुष्य उसके रहस्यों को जानने समझने में लगा रहे, क्योंकि पता नहीं कुदरत की कौन-सी करवट उसके लिए घातक निकल आए। बर्ल्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू की तरह ही निपाह वायरस अचानक प्रकट और गायब हो जाने वाली बीमारी है। इसका इतिहास 1999 से सिंगापुर और मलेशिया से शुरू हुआ बताया जाता है।

उसके बाद पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में यह बीमारी 2001 में उपस्थित हुई थी। उसमें 45 लोगों की मौत हुई थी। शायद वैज्ञानिक और उन्हें प्रोत्साहित करने वाली संस्थाएं बेखबर होकर दूसरे काम में लग गई। वरना कोई वजह नहीं है कि अब तक इसका वैक्सीन तैयार न हो पाता। जिस तरह हमारी सरकारी वैज्ञानिक संस्थाओं के शोध कार्यों में सुस्ती आई है और उनकी जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियां ज्यादा चुस्त हुई हैं। उससे साबित होता है कि सरकारों में स्वास्थ्य की चुनौतियों से निपटने की तत्परता कम है। सरकारों ने अपने जनाधार के लिए वैज्ञानिक की बजाय समाज विज्ञानी शोधों पर ध्यान देना आवश्यक समझा है। उस प्राथमिकता को बदलने की जरूरत है।

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Editorial

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×