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देश को पीछे खींचने वाले राज्यों का विकास कैसे हो?

मानव विकास सूचकांक में भारत दुनिया के 188 देशों में 133 वें पायदान पर है।

Dainik Bhaskar

Apr 25, 2018, 08:21 AM IST
bhaskar editorial on niti aayog CEO Amitabh Kant statement

नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने सही कहा है कि देश के उत्तर और पूर्व के राज्य उसे पिछड़ा बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में खान अब्दुल गफ्फार खान स्मृति व्याख्यान में उन्होंने स्पष्ट तौर पर बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान का उल्लेख करते हुए कहा कि इन राज्यों के कारण मानव विकास सूचकांक में भारत दुनिया के 188 देशों में 133 वें पायदान पर है। विडंबना देखिए कि आजादी की लड़ाई में सर्वाधिक योगदान देने वाले और आजादी के बाद देश की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले ये राज्य विकास के मोर्चे पर पिछड़े ही रह गए।

आज भी देश के सबसे पिछड़े जिलों में कई जिले इन्हीं राज्यों से हैं। आबादी के लिहाज से सबसे बड़े और देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश का श्रावस्ती जनपद अपने पिछड़ेपन और गोंडा जिले अपनी गंदगी के कारण देश में शीर्ष पर है। श्रावस्ती वह जनपद है, जिसका नगर बौद्धकाल में इतना समृद्ध था कि वहां हर वस्तु मिलती थी और उसके सेठ अनाथ पिंडक ने स्वर्ण मुद्राएं बिछाकर बुद्ध के लिए गंधकुटीर की जमीन खरीदी थी।

दरअसल बीमारू राज्य कहे जाने वाले ये प्रदेश दक्षिणी और पश्चिमी प्रदेशों के मुकाबले इसलिए पिछड़े हुए हैं, क्योंकि यहां राजनीतिक आंदोलन तो हुए लेकिन सामाजिक सुधार के आंदोलन कम से कम हुए। ध्यान देने की बात है कि 1991 में शुरू हुए उदारीकरण के दौर में उत्तर भारत के राज्य मंडल और मंदिर के आंदोलनों में उलझे रहे तो दक्षिणी और पश्चिमी राज्य भूमंडलीकरण का लाभ लेते रहे। उत्तर भारत में दिल्ली और एनसीआर के अलावा पंजाब और हरियाणा को जरूर भूमंडलीकरण का लाभ मिला लेकिन बिहार, राजस्थान अपने सामंती ढांचे से जूझता रहा तो उत्तर प्रदेश भगवान राम के मंदिर आंदोलन में उलझा रहा। पूरे देश की राजनीति तय करने के जोश में इन राज्यों ने अपने विकास की ओर ध्यान ही नहीं दिया। यह एक तरह की बादशाहत की बीमारी है।

इन राज्यों को विकास की जब तक सुध आई तब तक दक्षिण के राज्य काफी आगे निकल गए। इसके विपरीत दक्षिण के राज्यों के नेताओं का सरोकार राष्ट्रीय न होकर क्षेत्रीय रहा है। आज सवाल यह है कि विकास का यह असंतुलन कैसे दूर होगा। नीति आयोग के सीईओ की तरफ से उधर ध्यान दिलाया जाना तो उचित है लेकिन राजनेताओं का ध्यान बदले बिना उसका समाधान नहीं होगा।

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