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उफनते तेल पर फिसलते रुपए का महंगा असर

अमेरिकी पाबंदी का सीधा असर तेल उत्पादन पर होता है। एक तरफ तेल के दाम बढ़ते हैं तो दूसरी तरफ डॉलर मजबूत होता है।

Dainik Bhaskar

May 09, 2018, 12:52 AM IST
bhaskar editorial on Oil price

डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत से बेचैनी पैदा होना स्वाभाविक है और जब इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय कारण हों तो हम राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते। फरवरी 2017 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि डॉलर के मुकाबले रुपए का भाव 67.17 तक गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान पर पाबंदी लगाने के एेलान के बाद यह और भी गिर सकता है। ट्रम्प मंगलवार को ही ईरान के साथ हुए नाभिकीय समझौते को रद्‌द कर उस पर पाबंदी लगाने वाले हैं। उस फैसले के एेलान के बाद डॉलर की मजबूती बढ़नी ही है।

अमेरिकी पाबंदी का सीधा असर तेल उत्पादन पर होता है। एक तरफ तेल के दाम बढ़ते हैं तो दूसरी तरफ डॉलर मजबूत होता है। कच्चे तेल का दाम 75 डॉलर प्रति बैरल होते देख तेल कंपनियों ने डॉलर इकट्‌ठे करने शुरू कर दिए और इससे डॉलर की मांग बढ़ती जा रही है। कच्चे तेल के दामों में यह बढ़ोतरी तकरीबन चार साल बाद हो रही है और उसकी वजह ईरान पर लगने वाली पाबंदी के साथ ही वेनेजुएला के तेल उत्पादन में आई कमी भी है।

डॉलर के मुकाबले रुपए की यह गिरावट न सिर्फ और होगी बल्कि इसके कुछ और दिन ठहरने की उम्मीद है। ऐसी संभावना न सिर्फ भारत के आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने जताई है बल्कि डायशे बैंक, डीबीएस बैंक, बैंक ऑफ अमेरिका, यश बैंक, आईएफए ग्लोबल भी ऐसा ही सोच रहे हैं। उनका तो यहां तक अनुमान है कि डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 70 तक जाने वाली है।

इस गिरावट से जहां निर्यातकों की चांदी है वहीं आयातकों की सांसत है। बड़ी दिक्कत चालू खाते के घाटे के स्तर पर होने वाली है और स्पष्टतः वह बढ़ेगा। जब तेल आयात महंगा होगा तो घरेलू बाजार में तेल के पहले से बढ़े हुए दाम और भी बढ़ेंगे। जब तेल के दाम बढ़ेंगे तो फल-सब्जी और खाने-पीने की चीजों के दामों का बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे सामान जो आयातित उपकरणों से बनते हैं जैसे कि कार, कम्यूटर, स्मार्टफोन वे सब महंगे हो जाएंगे।

शादी ब्याह के इस मौसम में रुपए का मूल्य गिरने से गहनों के दाम बढ़े हैं और उनकी मांग में दो से चार प्रतिशत की गिरावट आई है। घरेलू मुद्रा का अवमूल्यन होने से कुछ लाभ भी होता है और वह निर्यात करने वाली सूचना प्रौद्योगिकी और फार्मा कंपनियों के हिस्से में जाएगा। ऐसे में अगर लोग जातीय भावनाओं से अलग हट कर सोचेंगे तो इसका असर राजनीति पर भी पड़ेगा।

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