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भास्कर संपादकीय: बेंगलुरू में विपक्षी एकता की शुरुआत के मायने

अपनी अखिल भारतीय उपस्थिति के बावजूद कांग्रेस इसमें बड़े भाई की भूमिका वाली पार्टी रह नहीं गई है।

Bhaskar News | Last Modified - May 25, 2018, 08:45 AM IST

भास्कर संपादकीय: बेंगलुरू में विपक्षी एकता की शुरुआत के मायने

बेंगलुरू में कुमारस्वामी के नेतृत्व में जनता दल (एस) और कांग्रेस की सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में इक्का-दुक्का छोड़कर लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दलों का एक मंच पर आना संकेत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके राजग गठबंधन के विकल्प की तलाश तेज हो गई है। हालांकि, मोदी विरोधी एकता का संदेश देने के लिए जुटे तकरीबन 11 दलों में से किसी के पास मोदी के टक्कर का कोई करिश्माई नेता नहीं है न ही उनमें से कोई भी भाजपा जैसी चुनावी मशीनरी वाली पार्टी है। अपनी अखिल भारतीय उपस्थिति के बावजूद कांग्रेस इसमें बड़े भाई की भूमिका वाली पार्टी रह नहीं गई है।

इसके बावजूद विपक्षी एकता की इस पहल के पीछे यह विश्वास है कि विविधताओं वाला यह देश न तो किसी व्यक्ति का एक छत्र शासन सहता है और न ही किसी दल का। देश ने 2014 में एक चौथाई सदी की गठबंधन की राजनीति को ठुकराकर एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया और एक नेता में विश्वास जताया, इसके बावजूद उस नेता और दल ने गठबंधन को न तो व्यवहार में और न ही सिद्धांत में पूरी तरह से त्यागा। इसलिए 1996 के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर इकट्‌ठा हुए दलों और उनके नेताओं को देखकर यह आस बंधती है कि वे भाजपा विरोधी महागठबंधन की राह पर चलकर देश के सामने 2019 में विकल्प प्रस्तुत करेंगे। ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि देश में जब-जब गठबंधन सरकारें बनी हैं तो वे अस्थिर रही हैं।

इसके विपरीत सच्चाई यह भी है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की स्थिर सरकारों और एक छत्र शासन के दौरान भी लोग बहुत असंतुष्ट रहे हैं। इसीलिए पहले गैर-कांग्रेसवाद का सिद्धांत उभरा और उसी तर्ज पर आज गैर-भाजपावाद की अवधारणा चल निकली है। गैर-भाजपावाद के इस कारवां में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, द्रमुक के स्टालिन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला का न होना और टीआरएस के चंद्रशेखर राव का एक दिन पहले आकर देवगौड़ा से मिलकर चले जाना यह बताता है कि इस गठजोड़ को अभी अपनी मुकम्मल शक्ल के लिए तमाम पैबंद लगाने होंगे। इन दलों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें तोड़ने के लिए भाजपा और राजग की पार्टियां पूरी ताकत लगा देंगी। इनके बावजूद गठबंधन भारतीय लोकतंत्र का स्वाभाविक विकास है और हमें 2019 में उसकी भूमिका के लिए तैयार रहना चाहिए।

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