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जब लंदन में प्रधानमंत्री मोदी ने कही भारत की बात

उन सब ने इस कार्यक्रम में इकट्‌ठा होकर मोदी के साथ भारत की अच्छी छवि प्रस्तुत करने में विशेष भूमिका निभाई।

Dainik Bhaskar

Apr 20, 2018, 01:20 AM IST
bhaskar editorial on pm modi london speech

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संवाद कला में माहिर हैं और इसे उन्होंने एक बार फिर लंदन में ‘भारत की बात सबके साथ’ कार्यक्रम में साबित की है। कार्यक्रम के प्रस्तोता और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने पूरे कार्यक्रम की संरचना भी इस तरह से तैयार की थी कि घरेलू मोर्चे पर विरोधपूर्ण वातावरण से घिरे मोदी की आम चुनाव से पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कर्मठ, समझदार और संवेदनशील नेता की छवि उभरे। यूरोप में भारतवंशियों की बड़ी संख्या है और उनके केंद्र में गुजरातियों की एकजुटता भी है। उन सब ने इस कार्यक्रम में इकट्‌ठा होकर मोदी के साथ भारत की अच्छी छवि प्रस्तुत करने में विशेष भूमिका निभाई।

दूसरी तरफ वहां प्रधानमंत्री की शानदार अगवानी के साथ ही भारत के कठुआ और उन्नाव के दुष्कर्म और अन्य हिस्सों में धर्म और जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव की गूंज लंदन में भी सुनाई दी। अगर प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में नारे लगाने वाले थे तो उनके विरोध में भी बैनर लहराने वाले दिखे। प्रधानमंत्री ने देश से परदेस तक यह कहकर सांत्वना देने की कोशिश की कि दुष्कर्म पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और अगर भारत में लाखों समस्याएं हैं तो यहां करोड़ों समाधान भी हैं।

लंदन से दिए गए प्रधानमंत्री के इस संदेश की एक खास बात यह रही कि वे पाकिस्तान के प्रति सख्त थे लेकिन, अपने देश के विरोधियों के लिए थोड़े नरम। उन्होंने आतंकवाद का निर्यात करने वालों को यह बताने का प्रयास किया कि भारत बेवजह किसी देश की जमीन नहीं हथियाएगा लेकिन, वह चुप होकर हमला नहीं सहता रहेगा। कर्नाटक चुनाव के मौके पर लंदन में भगवान बसवेश्वर के प्रति अपना सम्मान व्यक्त कर उन्होंने यह कहने का प्रयास किया कि भारत की जाति-व्यवस्था का समाधान उसके संतों के संदेशों और उनके आचरण में है।

मोदी ब्रिटेन से भारत का व्यापार बढ़ाने गए थे और एक अरब पौंड का व्यापार समझौता भी किया है। उनका प्रयास सराहनीय है लेकिन, स्मरण रहे कि हमारे प्रतिद्वंद्वी देश चीन और ब्रिटेन के बीच व्यापारिक संबंध का आकार हमसे कई गुना बड़ा है। मोदी ने इस बात पर चिंता जताई कि आज़ादी के बाद भारत की संस्कृति और परम्परा की उपेक्षा की गई लेकिन, वे जब तक धर्म के नाम पर फैलाई जा रही नफरत नहीं रोकेंगे तब तक श्रेष्ठ और समृद्ध भारत बना पाना कठिन होगा।

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