इंसानियत की भावना बचाएं जिस पर संविधान खड़ा है / इंसानियत की भावना बचाएं जिस पर संविधान खड़ा है

Bhaskar News

Apr 24, 2018, 01:06 AM IST

आपातकाल उसके सबसे भयानक नतीजे के रूप में सामने आया। आज फिर कार्यपालिका को सर्वशक्तिमान बनाने का अभियान चल निकला है।

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कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने संविधान बचाओ अभियान की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर करारा हमला बोला है। भले ही कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों की तरफ से प्रस्तुत सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव खारिज हो गया हो लेकिन, उनके इस अभियान में लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण का मुद्‌दा स्पष्ट तौर पर शामिल है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच खींचतान चलती रहती है।

इसके समन्वय से नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार होती है। वे दोनों राष्ट्रनिर्माण रथ के दो पहिए हैं, जो एक-दूसरे को संतुलित करते हैं न कि नष्ट। इसके लिए जरूरी है कि देश को चलाने वाले राजनीतिक दलों की संवैधानिक मूल्यों में आस्था हो। वह मूल्य बहुमत की मनमानी से संचालित नहीं होते बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की जीवंतता और अल्पमत व असहमति के आदर से निर्मित होते हैं।

दुर्भाग्य है कि स्वाधीनता संग्राम के त्याग-बलिदान से निकले हमारे संवैधानिक मूल्यों को स्वार्थ और पाखंड के सहारे तिलांजलि देकर राजनीतिक दल सत्ता पर किसी तरह कब्जा करने में लगे हुए हैं। आजादी के आरंभिक वर्षों में संविधान निर्माताओं को देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के निर्माण और उन्हें मजबूत करने की चिंता रहती थी। बाद में उसे धीरे-धीरे उसे कमजोर करने और कार्यपालिका को सशक्त करने की कोशिश तेज हो गई। आपातकाल उसके सबसे भयानक नतीजे के रूप में सामने आया। आज फिर कार्यपालिका को सर्वशक्तिमान बनाने का अभियान चल निकला है।

सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा विवाद उसी कोशिश का नतीजा है। इस दौरान सीएजी, सीवीसी, पिछड़ा वर्ग आयोग, अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग, महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, मानवाधिकार आयोग, प्रेस परिषद जैसी तमाम संस्थाओं की कमजोरियां प्रकट हो रही हैं। इसलिए अगर भाजपा नीत एनडीए सरकार यह अलोकतांत्रिक कार्य जानबूझकर कर रही है तो उसके बारे में जनता को जाग्रत करना विपक्ष का दायित्व है। उधर कांग्रेस संविधान को सिर्फ डॉ. आंबेडकर और दलितों से जोड़कर देख रही है, जो एक प्रकार की संकीर्णता है। ऐसे में राजनीतिक दलों से यही कहा जा सकता है कि संविधान बचाइए लेकिन, उससे पहले इंसानियत की उस भावना को बचाइए जिस पर संविधान खड़ा है।

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