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भास्कर संपादकीय: राज्य के स्तर पर जातियों को मान्यता के परिणाम

अगर किसी को जाति के आधार पर आरक्षण मिल रहा है तो उसका आधार संबंधित राज्य का प्रमाण-पत्र ही होगा

Danik Bhaskar | Aug 31, 2018, 11:51 PM IST

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण की व्यवस्था को राज्यों के स्तर पर ही मान्यता देने की स्थिति को कायम रखते हुए जहां अराजकता से बचने की कोशिश की है वहीं सामाजिक गतिशीलता और भारतीय नागरिकता के लचीले दृष्टिकोण को बाधित भी किया है।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की खंडपीठ ने संवैधानिक व्यवस्था को पुनर्परिभाषित करते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 341 और अनुच्छेद 342 के अनुसार किसी भी नागरिक का जाति का स्तर सिर्फ उसी राज्य में रहता है वह उसे लेकर दूसरे राज्य में पलायन नहीं कर सकता।

यानी दूसरे राज्य में उस जाति के प्रमाण-पत्र की मान्यता नहीं होगी। अगर किसी को जाति के आधार पर आरक्षण मिल रहा है तो उसका आधार संबंधित राज्य का प्रमाण-पत्र ही होगा। यानी एक राज्य का अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति दूसरे राज्य में उस जाति का नहीं माना जाएगा भले ही उसने वहां रोजगार और शिक्षा के लिए पलायन किया है। न्यायालय का कहना है कि अगर ऐसा किया गया तो अनुच्छेद 341 और 342 का महत्व ही समाप्त हो जाएगा।

अदालत ने चेतावनी दी है कि जातियों की सूची के साथ राज्य छेड़छाड़ भी नहीं कर सकते। किस राज्य में कौन-सी जाति आरक्षण की श्रेणी में है उसके बारे में संसदीय सूची ही प्रामाणिक होगी। न्यायालय ने यह व्यवस्था देश में लगातार हो रहे आरक्षण संबंधी आंदोलनों और विभिन्न जातियों द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची में शामिल किए जाने की मांग और आरक्षण व जातियों की नई-नई मांगों की अराजकता से बचने के लिए दी है। लेकिन इसके कुछ दुष्परिणाम भी हैं।

जब कोई नागरिक किसी दूसरे राज्य में ब्याह करता है या नौकरी के लिए जाता है तो उसके साथ उसके जन्म वाले राज्य का प्रमाण-पत्र ही रहता है। इससे भारत की एकता के सदर्भ में होने वाली सोशल इंजीनियरिंग में ही नहीं रुकावट आती बल्कि वह व्यक्ति आरक्षण की सुविधा के लिए भी दो राज्यों के बीच भटकता फिरता है। आरक्षण लाया इसलिए गया था कि जाति की व्यवस्था टूटे और समाज में समानता और समरसता आए लेकिन, हो उल्टा रहा है। इससे समाज पुराने खांचों में जकड़ता जा रहा है और नए और खुले समाज के निर्माण में दिक्कतें भी उत्पन्न हो रही हैं। इसलिए जरूरत एक नई सोच और व्यवस्था की भी है।