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स्वच्छाग्रह ठीक है लेकिन सत्याग्रह को भी न भूलें

जाट आंदोलन, मराठा आंदोलन, भीमा कोरेगांव की हिंसा, गोरक्षा के बहाने गुंडागर्दी और फिर भारत बंद का उपद्रव देश को भीतर से ख

Dainik Bhaskar

Apr 11, 2018, 12:34 AM IST
bhaskar editorial on swachhagraha movements

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोतीहारी में आयोजित महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह की समापन सभा को स्वच्छाग्रह में बदलकर न सिर्फ यह संकेत दिया है कि सरकार विकास के एजेंडे से पीछे नहीं हटने वाली है बल्कि समाज में बढ़ते विभाजन को भी उसी से पाटने की कोशिश करेगी। इसीलिए उन्होंने अपने 2014 के आम चुनाव के नारे ‘सबका साथ सबका विकास’ को दोहराते हुए कहा कि कुछ लोग तीव्र विकास से परेशान हैं और जन मन को जोड़ने की बजाय उसे तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

इस दौरान उन्होंने फ्रांस के सहयोग से चल रहे मधेपुरा के लोकोमोटिव कारखाने में बने 12000 हार्स पावर के इंजन का भी जिक्र किया, जिसने भारत को रूस, चीन, स्वीडन और जर्मनी की श्रेणी में पहुंचा दिया है। अपने जोशीले भाषण में मोदी का प्रयास अगले चुनाव के लिए अपनी सरकार का काम गिनाने के साथ ही एनडीए विशेषकर बिहार के उन नेताओं और दलों को एकजुट रखने का दिख रहा था, जिनके असंतुष्ट होने की खबरें आ रही हैं।

इसके बावजूद प्रधानमंत्री देश की सामाजिक एकता और सद्‌भाव के सवाल से कन्नी काटते हुए दिखे जो इस समय बिहार समेत पूरे देश को बेचैन किए हुए हैं। संयोग से प्रधानमंत्री जिस समय मोतिहारी में शौचालय निर्माण, गंगा और मोतीहारी झील की सफाई का जिक्र कर रहे थे उसी समय दलितों के दो अप्रैल के बंद के जवाब में आयोजित सवर्णों के भारत बंद में सबसे ज्यादा हिंसा बिहार में ही हो रही थी।

उससे पहले बिहार के भागलपुर समेत कई जिले सांप्रदायिकता की चपेट में आ चुके थे। जाति और धर्म के ये टकराव एनडीए को तोड़ रहे हैं। इसलिए सारी सदिच्छा के बावजूद मोदी की ये घोषणाएं तभी सफल हो सकती हैं, जब सामाजिक सद्‌भाव और सामाजिक न्याय का वातावरण बने। जाट आंदोलन, मराठा आंदोलन, भीमा कोरेगांव की हिंसा, गोरक्षा के बहाने गुंडागर्दी और फिर भारत बंद का उपद्रव देश को भीतर से खोखला कर रहा है। ऐसे में गांधी के सत्याग्रह को स्वच्छाग्रह में सीमित करने की बजाय गांधी सत्याग्रह के मूल उद्‌देश्य को समझना होगा।

उनके लिए सांप्रदायिक सद्‌भाव बेहद जरूरी कार्यक्रम था और अगर आंबेडकर को भी उनके साथ जोड़ा जाए तो जाति उन्मूलन के बिना भारतीय समाज में शांति नहीं आने वाली है। इन चुनौतियों को दूसरों पर थोपने की बजाय प्रधानमंत्री को उनका मुकाबला करना ही होगा।

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