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भास्कर संपादकीय: तूतीकोरिन की घटना उद्योग और समाज के लिए घातक

पलानीस्वामी सरकार ने जयललिता जैसी संवेदनशीलता नहीं दिखाई और आंदोलनकारियों के मारे जाने की नौबत आई।

Bhaskar News | Last Modified - May 24, 2018, 12:16 AM IST

भास्कर संपादकीय: तूतीकोरिन की घटना उद्योग और समाज के लिए घातक

तूतीकोरिन की घटना इस देश के पर्यावरण आंदोलन की सर्वाधिक हिंसक घटना है और इससे न तो समाज का भला होना है और न ही उद्योग का। सरकार को तो इसके परिणाम भुगतने ही पड़ेंगे। आंदोलनकारियों और सरकार दोनों को जिस संयम की जरूरत थी, वह नहीं बरता गया और लगता है कि पुलिस प्रशासन अपने पुलिस अधीक्षक की सुरक्षा को लेकर ज्यादा ही संवेदनशील हो गया और उसने औरतों और बच्चों वाले उस जुलूस पर सीधे फायरिंग की। वेदांता समूह चाह रहा था कि वह अपने स्टरलाइट संयंत्र में तांबे का उत्पादन बढ़ाए, लेकिन उसे वन और पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति नहीं मिल पा रही थी। इस बीच दो दशक से प्रदूषण के कारण संयंत्र को बंद करने और चलाने के लिए कानूनी वाद भी चल रहा था, जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। संयोग से फायरिंग और दस लोगों की जान जाने के बाद बुधवार को मद्रास हाईकोर्ट ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के विस्तार पर स्टे दे दिया। अगर ऐसा थोड़ा पहले हुआ होता तो शायद मौजूदा स्थिति से बचा जा सकता था।

देश में पर्यावरण बचाने के लिए कभी चिपको, कभी अप्पको, कभी टिहरी बांध, कभी नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध के विरुद्ध संघर्ष चलते रहे हैं। इसके बावजूद उनका संघर्ष शांतिपूर्ण रहा है और उसके पीछे गांधीवादी विचारधारा की प्रेरणा रही है। उसके विपरीत नंदीग्राम में किसानों के संघर्ष में 14 लोग मारे गए। उस आंदोलन में किसानों को माओवादियों का समर्थन था। तूतीकोरिन संयंत्र के प्रदूषण के विरुद्ध आंदोलन 1996 से ही चल रहा है और 2013 में गैस लीक के कारण तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने संयंत्र बंद करने का आदेश भी दिया था। मंगलवार को लोग अपने आंदोलन का 100वां दिन मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे। निश्चित तौर पर इन दिनों पर्यावरण के शांतिपूर्ण आंदोलन खामोश या पराजित हैं और पर्यावरण संबंधी लड़ाई या तो अदालत(एनजीटी) में लड़ी जा रही है या यदा-कदा हिंसक प्रतिरोध के रूप में। ऐसे में सरकार और उद्योगपतियों की यह जिम्मेदारी ज्यादा बनती है कि वे पर्यावरण और प्रदूषण संबंधी कानूनों को बिना किसी धांधली के लागू कराएं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक खींचतान में फंसी तमिलनाडु की पलानीस्वामी सरकार ने जयललिता जैसी संवेदनशीलता नहीं दिखाई और आंदोलनकारियों के मारे जाने की नौबत आई।

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