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उपवास की बाहरी प्रतिस्पर्धा और असली हृदय परिवर्तन

विडंबना यह है कि कांग्रेस ने दो दिन पहले एनडीए सरकार के विरुद्ध उपवास किया तो सरकार ने कांग्रेस के विरुद्ध।

Bhaskar News | Last Modified - Apr 13, 2018, 12:26 AM IST

जातिवादी और साम्प्रदायिक हिंसा के बाद शुरू हुई उपवास की राजनीति का स्वागत किया जाना चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा प्रदान किया गया यह ऐसा हथियार है, जिसमें उपवास करने वाला स्वयं कष्ट सहकर विरोधी का हृदय परिवर्तन करता है। कई बार यह काम अपने पापों के प्रायश्चित और अपनों के हृदय परिवर्तन के लिए भी किया जाता है। इसलिए संसद के बजट सत्र के बेकार चले जाने के प्रायश्चित स्वरूप अगर सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर उपवास करते तो वह वास्तव में लोकतंत्र बचाओ उपवास होता। विडंबना यह है कि कांग्रेस ने दो दिन पहले एनडीए सरकार के विरुद्ध उपवास किया तो सरकार ने कांग्रेस के विरुद्ध।

विपक्ष चाहता था कि संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण का उपयोग वह सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए करे और आगामी चुनाव के लिए सरकार विरोधी माहौल बनाए। इसके लिए वह बैंकिंग घोटाला, सीबीएसई पेपर लीक और अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न अधिनियम को कमजोर बनाए जाने को मुद्‌दा बनाना चाहता था। सरकार नहीं चाहती थी कि संसद के मंच का उसके विरुद्ध इस्तेमाल हो। इस दौरान कई प्रकार के नाटक हुए और उन पार्टियों ने सत्र को बाधित किया जो सरकार की करीबी मानी जाती हैं।

अन्नाद्रमुक ने कावेरी जल विवाद का मुद्‌दा इस तरह से उठाया कि तेलुगु देशम और वाईएसआर कांग्रेस व कांग्रेस की अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश बेकार चली गई। अविश्वास प्रस्ताव संसदीय नियमों का हिस्सा भले न हो लेकिन, वह संसदीय परम्परा का दीर्घकालिक हिस्सा है। इसके माध्यम से विपक्ष जनता के असंतोष को व्यक्त करता है और सरकार के कामकाज पर अपना दबाव बनाता है। अब जबकि विपक्ष और सरकार के बीच उपवास की प्रतिस्पर्धा चल रही है तो ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि देखिए मोदी ने पहले सरदार पटेल को कांग्रेस से छीन लिया और अब उन्होंने उपवास करके महात्मा गांधी को भी उनसे हड़प लिया।

राहुल गांधी के नेतृत्व में आयोजित कांग्रेस के सत्याग्रह यज्ञ को उसके अपने ही लोगों ने भंग कर दिया। उसकी तुलना में मोदी सरकार का उपवास ज्यादा व्यवस्थित रहा। इसके बावजूद असली सवाल हमारी साड़ी के तुम्हारी साड़ी से ज्यादा सफेद होने का नहीं है। सवाल है देश में जातिगत और साम्प्रदायिक सद्‌भाव कायम करने का। काश पूरा देश अंतरमन से उस सद्‌भाव के लिए उपवास करता।

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