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भास्कर संपादकीय: जीएसटी पर वैचारिक नहीं, तथ्यात्मक बहस हो

निष्कर्ष यही है कि जीएसटी से अर्थव्यवस्था को कुछ फायदा हुआ है तो आम नागरिकों को नुकसान।

Dainik Bhaskar

Jul 03, 2018, 03:05 AM IST
bhaskar editorial over gst

वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी लागू किए जाने का साल पूरा होने पर एक तरफ जश्न मनाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर मातम। इस विभाजन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस तंज ने और चौड़ा कर दिया है कि मिल्क और मर्सेडीज दोनों पर एक ही तरह का कर नहीं लगाया जा सकता। इसके जवाब में कांग्रेस के नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि अगर सरकार करों की दरें समान नहीं कर सकती तो उसे इसका नाम आरएसएस कर रख लेना चाहिए।

इस बात को कांग्रेस से बेहतर कौन-सी पार्टी जानती होगी कि नारे देना एक बात है और उसे लागू करना दूसरी बात। अगर नारों के मुताबिक ही काम होता तो अब तक भारत की गरीबी मिट गई होती। कांग्रेस के विपरीत भाजपा रोमांटिक नारों में यकीन करती है और उसे एक तथ्य के रूप में थोपना चाहती है। निष्कर्ष यही है कि जीएसटी से अर्थव्यवस्था को कुछ फायदा हुआ है तो आम नागरिकों को नुकसान।

जीएसटी समर्थकों का दावा है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने की दिशा में कदम उठाया है और उसी के चलते सवा अरब भारतीयों की अर्थव्यस्था अब जाकर 6.6 करोड़ ब्रिटिश नागरिकों के बराबर पहुंच रही है। प्रधानमंत्री का यह दावा भी उचित है कि अप्रत्यक्ष करों के आधार में 70 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है और 17 किस्म के कर और 23 किस्म के उपकर एक ही कर में विलीन कर दिए गए हैं। निश्चित तौर पर जीएसटी लागू होने से बड़ी कंपनियों को इंस्पेक्टर राज से निजात मिली है, चेक पोस्ट से राहत मिली है और कर दरें घटने से भी सुविधा हुई है। लेकिन, छोटे उद्यमियों की परेशानी बढ़ी है और इसीलिए तमिलनाडु के उद्योग मंत्री का यह दावा अतिरेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता कि उनके राज्य में 50,000 औद्योगिक इकाइयां बंद हुई हैं और असंगठित क्षेत्र से पांच लाख नौकरियां गई हैं।

जीएसटी के आलोचकों का दावा है कि देशभर में इस दौरान कुल एक करोड़ नौकरियां गई हैं। जीएसटी लागू होने के बाद वर्ष 2017-18 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में सबसे कम यानी 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, जो पूर्ववर्ती वर्षो में सबसे कम है। घरेलू निवेश में भी गिरावट आई है जबकि, वस्तुओं के दाम घटे नहीं हैं। पेट्रोल, शराब, बिजली और रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे में लाए जाने की बहस जारी है। देखना है कि इन बहसों से उठे विमर्श से निकलकर जीएसटी कैसे सबके लिए कल्याणकारी साबित होता है।

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