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भास्कर संपादकीय: अमेरिका में पनाह मांगने वाले हिंदुस्तानी बढ़े

भारतीयों के लिए वे वजहें भी नहीं होतीं जो चीन जैसे अधिनायकवादी देश के साथ जुड़ी हुई हैं।

Danik Bhaskar | Jun 22, 2018, 12:47 AM IST
सांकेतिक तस्वीर। सांकेतिक तस्वीर।

संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार 2017 में अमेरिका में 7000 भारतीयों ने शरण मांगी, जो दुनियाभर में शरण मांगने वाले भारतीयों की संख्या का तकरीबन छठवां हिस्सा है। पिछले साल विश्व के कई देशों में 40,391 भारतीयों ने शरण मांगी, जबकि दुनिया में पनाह मांगने वाले कुल 1,93,146 थे। भारत जैसे लोकतांत्रिक और बड़े देश के नागरिकों द्वारा किसी विकसित देश में शरण मांगने की वजहें वह नहीं हो सकतीं जो कांगो, सूडान, मैक्सिको, हैती, इराक, सीरिया और म्यांमार जैसे देशों के नागरिकों के लिए होती हैं।

भारतीयों के लिए वे वजहें भी नहीं होतीं जो चीन जैसे अधिनायकवादी देश के साथ जुड़ी हुई हैं। इसके बावजूद अगर भारतीय नागरिक अमेरिका और दूसरे यूरोपीय देशों में शरण मांगते घूम रहे हैं तो भारत को उन कारणों पर विचार करना चाहिए, जिनके आधार पर वे पनाह मांग रहे हैं, क्योंकि यह हम पर प्रतिकूल टिप्पणी है।

अमेरिका में हाल में ट्रम्प की शरणार्थियों के साथ सख्ती करने वाली नीति के शिकार वे 52 भारतीय भी हैं, जिन्हें उनके बच्चों से अलग करके ओरेगांव की जेलों में बंद कर दिया गया है। वे वहां न तो वकीलों की मदद ले पा रहे हैं और न पंजाबी और हिंदी का अनुवादक उन्हें प्राप्त हो रहा है। शरण मांगने वाले यह नागरिक अलग-अलग वजहें बताते हैं लेकिन, शरण पाने में वही सफल होता है जो राजनीतिक रूप से रसूखदार होता है। आम आदमी का शरण मांगने वाले देश में भी बाहें फैलाकर स्वागत नहीं होता। इसलिए हर शरणार्थी की समस्या और आवेदन को युद्धऔर दमन से पीड़ित मान लेना उचित नहीं है लेकिन, उसके आवेदन को नस्लीय पूर्वग्रह से ग्रसित होकर खारिज करना भी ठीक नहीं है।

शरणार्थियों के बारे में व्यावहारिक अनुभव यह भी बताता है कि इसमें वे छात्र भी होते हैं, जिनका वीज़ा खत्म हो गया है और कोर्स पूरा नहीं हुआ है या वे कुछ और पढ़ाई करना चाहते हैं। ऐसे छात्रों को पनाह मांगने से ज्यादा दिन रुकने में मदद मिल जाती है। दूसरी तरह के वे लोग हैं जिनके पास कौशल की कमी होने के बावजूद वे उच्च स्तरीय नौकरी के लिए विकसित देशों में ठहरना चाहते हैं।

दरअसल, शरणार्थी समस्या उत्पन्न इसलिए होती है कि सभी देश न तो लोकतांत्रिक हैं और न ही उनके विकास का स्तर समान है। समस्या तब खड़ी होती है जब संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश 1948 के मानवाधिकार घोषणा-पत्र के अनुसार व्यवहार नहीं करते।