संपादकीय

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भास्कर संपादकीय: ट्रम्प ने व्यापार युद्ध के लिए भारत को भी मजबूर किया

अब भारत ने भी अमेरिका से आयात होने वाली 29 वस्तुओं पर आयात कर बढ़ाने का निर्णय लिया है।

Danik Bhaskar

Jun 23, 2018, 12:21 AM IST
फाइल फोटो। फाइल फोटो।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के घातक कदमों से आजिज आकर आखिरकार भारत ने भी व्यापार युद्ध की दिशा में बिगुल बजाने का फैसला कर लिया है। इससे पहले चीन और यूरोपीय संघ भी अमेरिकी उत्पादों पर आयात कर बढ़ाने का फैसला कर चुके हैं। अब भारत ने भी अमेरिका से आयात होने वाली 29 वस्तुओं पर आयात कर बढ़ाने का निर्णय लिया है। इन वस्तुओं की सूची में फास्फोरिक एसिड जैसे रसायनों के अलावा ज्यादातर वस्तुएं खाने-पीने की हैं, जिनमें सेब, बादाम, अखरोट, दाल और इस्पात के कुछ उत्पाद शामिल हैं। हालांकि, भारत ने हर्ले डेविडसन नाम जैसी 800 सीसी के ऊपर वाली उन मोटरसाइकिलों को बख्श दिया है जो ट्रम्प के दिल के सबसे करीब हैं और जिन्हें लेकर वे दूसरे देशों को उलाहना देते रहते हैं।

ट्रम्प ने भारत से आयात होने वाले इस्पात और एल्यूमिनियम पर 9 मार्च को ही भारी कर लगा दिए थे और भारत के अनुरोध के बावजूद उसे वापस लेने को तैयार नहीं थे। उसके बाद भारत ने डब्लूटीओ की समिति के समक्ष कई वस्तुओं की सूची पेश करते हुए कहा कि वह हर्ले डेविडसन पर 50 प्रतिशत कर वृद्धि करने जा रहा है। निश्चित तौर पर भारत के इस फैसले की चोट अमेरिका को लगी है, क्योंकि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा आयातक है और यह उत्पाद भी ऐसे हैं जो उन्हीं राज्यों से आते हैं जहां ट्रम्प की पार्टी की सरकारें हैं।

यही कारण है कि अगले हफ्ते अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि मार्क लिन्सकाट वार्ता के लिए भारत आ रहे हैं और तभी भारत ने अपने फैसले के क्रियान्वयन की तारीख 4 अगस्त 2018 रखी है ताकि समझौते के लिए एक गलियारा खुला रहे। करों के बहाने छिड़े इस व्यापारिक युद्ध का आधार ट्रम्प और उनके समर्थकों की वह अमेरिकी सोच है कि दुनिया के सारे देश अमेरिका को गुल्लक मानते हैं और वे उसे लूटने में लगे हैं। इस लड़ाई में होने वाले फायदे की राष्ट्रवादी व्याख्याएं अपनी-अपनी जगह हैं।

भारत सोच रहा है कि उसे आयात शुल्क बढ़ाने से सिर्फ बादाम से 11.6 करोड़ डॉलर की आय होगी। उधर अमेरिका अपने देश में बाहरी उत्पादों को नियंत्रित करके अमेरिकी कंपनियों के दूसरे देशों में होने वाले निवेश को घटाना चाहता है। फिलहाल इस लाभ-हानि के खेल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था जरूर बढ़ रही है लेकिन, इस व्यापारिक युद्ध में जीतने वाला कोई नहीं होगा और नुकसान पूरी दुनिया को होगा।

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