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भास्कर संपादकीय: कश्मीर में समन्वय के श्रेष्ठ उदाहरण की भावना बनी रहे

कश्मीर की समस्या का हल जब भी निकलेगा तो कानून और व्यवस्था से आगे बढ़कर राजनीतिक संवाद से ही निकलेगा।

Dainik Bhaskar

Jun 26, 2018, 01:28 AM IST
bhaskar editorial over kashmir row

कश्मीर में महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद भाजपा और पीडीपी के बीच जो बहस छिड़ी है वह सोशल मीडिया और चैनलों के लिए और उससे आगे चुनाव के लिए तो मुफीद हो सकती है लेकिन, उससे कश्मीर जैसी जटिल समस्या का कोई समाधान निकलता नहीं दिखता। अगर अमित शाह कह रहे हैं कि महबूबा ने गठबंधन के कार्यक्रम पर नरम रुख अपनाया और कश्मीर के जम्मू और लद्दाख जैसे हिस्सों के साथ भेदभाव किया तो महबूबा का कहना है कि उन्होंने बाढ़ से तबाह घाटी पर विशेष ध्यान देकर गलत नहीं किया और भाजपा के मंत्रियों ने तब आपत्ति नहीं की थी।

महबूबा पर भाजपा का आरोप पत्थरबाज युवाओं के प्रति उदार दिखने का है तो महबूबा का कहना है कि भाजपा के नेता न सिर्फ दोनों समुदायों में दरार पैदा कर रहे हैं बल्कि पत्रकारों को धमका रहे हैं। विशेष तौर पर कठुआ दुष्कर्म कांड के आरोपियों के पक्ष में रैली करने वाले भाजपा के नेता चौधरी लाल सिंह ने जिस तरह पत्रकारों को मर्यादा लांघने पर शुजात बुखारी की गति को प्राप्त होने की चेतावनी दी उसकी चौतरफा निंदा हो रही है। पिछले तीन वर्षों में भाजपा और पीडीपी ने अपने-अपने जनाधार खोने की कीमत पर मिलकर सरकार चलाई, जो कश्मीर में लोकतंत्र और भारत की एकता अखंडता के लिए सराहनीय कदम ही कहा जाएगा। भले दोनों की विचारधारा विपरीत ध्रुव की थी और एक बेमेल गठबंधन में विफलता के तत्व होते हैं फिर भी अच्छे प्रयासों को इतने सहज तरीके से विफल बता देना ठीक नहीं है।

यह समन्वय का एक श्रेष्ठ उदाहरण था और उसकी भावना जारी रहनी चाहिए। कश्मीर की समस्या का हल जब भी निकलेगा तो कानून और व्यवस्था से आगे बढ़कर राजनीतिक संवाद से ही निकलेगा। इसलिए इस कठिन समय में न तो भाजपा को कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत को भूलना चाहिए और न ही पीडीपी को। इस समस्या का समाधान नेहरू बनाम पटेल की बहसों से भी नहीं निकलेगा, भले ही उससे कुछ नई जानकारियां सामने आएं। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है यह बात सिर्फ राष्ट्रीय दलों के नेताओं के बयानों में दोहराते जाना काफी नहीं है। यह बात कश्मीर की अवाम की तरफ से भी निकलनी चाहिए और उसके लिए प्रयास होना चाहिए। अभी भी देश इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर देख रहा है जो यह कहने से नहीं चूकते कि हिंसा में किसी समस्या का समाधान नहीं है।

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