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भास्कर संपादकीय: हमारे बैंकों की गड़बड़ी का एक नमूना है नीरव मोदी

ब्रिटेन ने सिर्फ एक व्यक्ति का प्रत्यर्पण किया है और वह है गुजरात के 2002 दंगों में वांछित समीर भाई विनू भाई पटेल।

Dainik Bhaskar

Jun 12, 2018, 06:00 AM IST
bhaskar editorial over Nirav Modi case

पंजाब नेशनल बैंक से 13500 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने वाले नीरव मोदी के ब्रिटेन पहुंचकर वहां राजनीतिक शरण मांगने का प्रयास हमारी हताश बैंकिंग प्रणाली के आत्मविश्वास पर गहरी चोट है। इससे उसे भारत लाकर दंडित करने और व्यवस्था में व्याप्त धोखाधड़ी के रास्तों को बंद करने के प्रयासों को धक्का लगेगा। भारत और ब्रिटेन के बीच सैकड़ों वर्ष पुराने संबंध होने के बावजूद प्रत्यर्पण संधि 1992 में हुई और उसका भी लाभ उठा पाना कोई आसान नहीं है। तब से अब तक भारत के आग्रह पर ब्रिटेन ने सिर्फ एक व्यक्ति का प्रत्यर्पण किया है और वह है गुजरात के 2002 दंगों में वांछित समीर भाई विनू भाई पटेल।

उससे पहले और उसके बाद कई आर्थिक और सामाजिक अपराधियों के प्रत्यर्पण का अनुरोध वहां की अदालत में लंबित है लेकिन, भारत को कामयाबी नहीं मिली है। उन नामों में आईपीएल घोटाले के आरोपी ललित मोदी, बैकों का कर्ज न चुकाने वाले किंगफिशर एयरलाइंस के मालिक विजय माल्या, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी नदीम सैफी, 1993 में विस्फोट के आरोपी टाइगर हनीफ और रविशंकरन शामिल हंै। इधर, नीरव मोदी के मामले में बैंक कर्मचारियों समेत 25 लोगों के विरुद्ध एफआईआर है लेकिन, भारत सरकार असली अभियुक्त पर हाथ नहीं धर पा रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाईवी रेड्‌डी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केंद्रीय बैंक को अपनी नियामक भूमिका और आचरण की समीक्षा करनी चाहिए। 2003 से 2008 तक रिजर्व बैंक की कमान संभालने वाले रेड्‌डी मानते हैं कि करदाताओं को सरकार और रिजर्व बैंक से जवाब तलब करना चाहिए। उससे पूछा जाना चाहिए कि वह किस तरह से जनता का न्यासी हैं। यह धोखाधड़ी सचमुच इतनी बड़ी है कि इससे बैंकों में जनता का यकीन घटता है।

आश्चर्य की बात यह है कि बट्‌टा खाते के कर्ज का बढ़ना इसलिए नहीं है कि बैंकों ने कृषि और सामाजिक क्षेत्र को कर्ज दिया और उसे माफ कर दिया गया बल्कि वह इसलिए है कि अमीर और ताकतवर लोगों ने कर्ज नहीं चुकाया। रेड्‌डी ने स्वीकार किया कि एनडीए की तरह यूपीए सरकार भी सार्वजनिक बैंकों के निदेशकों के चयन में कड़ी कसौटी बरतने के पक्ष में नहीं थी। नियुक्ति की शक्तियां सरकार के पास केंद्रित होने के कारण रिजर्व बैंक तब भी लाचार था और आज भी है।

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