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भास्कर संपादकीय: शुजात बुखारी जैसे संवाद सेतु का टूटना घातक

शुजात की पत्रकारिता अपनी जनता के दर्द को समझने की कोशिश थी और कश्मीर में शांति की एक तलाश थी।

Dainik Bhaskar

Jun 16, 2018, 02:06 AM IST
bhaskar editorial over shujaat bukhari murder case

शुजात बुखारी सिर्फ ‘राइजिं़ग कश्मीर’ के प्रधान संपादक ही नहीं कश्मीरियत और भारतीय पत्रकारिता की निर्भीक आवाज थे और उनकी हत्या से कश्मीर के लोगों के भीतर और उनके तथा सरकार के बीच संवाद का एक मजबूत सेतु टूट गया है। यह हत्या ऐसे समय हुई है, जब सरकार ने रमजान के महीने के कारण सुरक्षा बलों की कार्रवाई को नरम कर रखा था और अलगाववादियों व पाकिस्तान से वार्ता की पहल भी चला रखी थी। संयोग से बुखारी वार्ता के लिए अनौपचारिक काम भी कर रहे थे।

शुजात बुखारी ने ‘राइजिं़ग कश्मीर’ से पहले एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक के लिए कश्मीर से जमीनी रिपोर्टिंग की थी और अपनी निर्भीक खबरों के लिए देश और दुनिया में जाने जाते थे। कई अखबारों के लिए कॉलम लिखने वाले शुजात हिंसा के विरुद्ध थे और अपने अखबार में उनका आखिरी स्तंभ ‘खून से रंगा जून’ घाटी की इन्हीं स्थितियों पर की गई कठोर टिप्पणी थी। शुजात की पत्रकारिता अपनी जनता के दर्द को समझने की कोशिश थी और कश्मीर में शांति की एक तलाश थी। यही कारण था कि वे न तो आतंकियों को फूटी आंख सुहाते थे और न ही सत्ताधारी राजनेताओं को।

उन्होंने अपनी पत्रकार बिरादरी को भी झूठ फैलाने और युवाओं की निराशा को न समझने के लिए कोसा था। उनकी दृष्टि वही थी जो एक निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार की होनी चाहिए। इसीलिए कश्मीर की समस्या को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए वे कांग्रेस और भाजपा दोनों को समान रूप से दोषी मानते हुए कहते थे कि एक ने फसल बोई तो दूसरा उसे काट रहा है। इसी सोच के चलते वे कश्मीर की समस्या का समाधान महज ‘विकास, विकास और विकास’ के नारे में नहीं देखते थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 80,000 करोड़ रुपए के कश्मीर पैकेज में ज्यादा शांति की उम्मीद नहीं देखते थे।

शुजात के लिए कश्मीर कानून-व्यवस्था की नहीं संवादहीनता की राजनीतिक समस्या थी और उसका समाधान गोली और पत्थर से होने वाला नहीं है। हालांकि पाकिस्तानी विदेश विभाग ने शरारत करते हुए उनकी मौत को संयुक्त राष्ट्र की उस मानवाधिकार रपट से जोड़ा है, जिसमें कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन का वर्णन किया गया है। शुजात ने उस रपट पर ट्वीट किया था। शुजात की मौत सच्चाई और अमन की राह में एक पत्रकार की शहादत है।

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