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भास्कर संपादकीय: विदेश मंत्री स्वराज को ट्रोल करने वालों का धर्म

इसके अलावा हम देश के मध्यवर्गीय युवाओं को यह समझाने में नाकाम भी रहे हैं कि हमारे लोकतंत्र में कानून का राज है।

Danik Bhaskar | Jun 27, 2018, 12:37 AM IST

लखनऊ पासपोर्ट ऑफिस में अधिकारी विकास मिश्र और पासपोर्ट आवेदक तन्वी सेठ व उनके पति अनस सिद्‌दीकी के बीच हुए विवाद को साम्प्रदायिक रंग देना और पीड़ित पक्ष को न्याय हेतु त्वरित कार्रवाई करने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक को ट्रोल किया जाना अपने आप में दुखद है। कुछ राजनीतिक संगठनों, चैनलों और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जैसे इस देश में हिंदू-मुस्लिम समस्या ही सबसे बड़ी समस्या है। बात चाहे हिंदू हितों से शुरू हो या मुस्लिम तुष्टिकरण से, मामला लौटकर वहीं जाता है, जहां दोनों समुदायों के बीच कटुता की जमीन तैयार की जा सके। कुछ ऐसा ही इस मामले में भी हुआ और एक चैनल ने इस विवाद को इतना तूल दे दिया कि दूसरी ओर से भावनाओं का उबाल आ गया।

विदेश कार्य विभाग में काम की चुस्ती का माहौल बनाने के लिए चर्चित सुषमा स्वराज की त्वरित कार्रवाई से एक ऐसी महिला की मदद उन लोगों को गवारा नहीं हुई, जिसने हिंदू होते हुए एक मुस्लिम से शादी की है। उसके बाद सुषमा स्वराज पर गुर्दा बदले जाने जैसे निजी मामले को लेकर ऐसी गालियों की वर्षा हुई, जिसे सभ्य समाज के लिए सुनना और पढ़ना अशोभनीय है। इसलिए प्रश्न उठता है कि आखिर ट्रोल करने वाले उन महावीरों का क्या धर्म है, जिसमें न तो किसी पद की मर्यादा का ख्याल है और न ही व्यक्ति और स्त्री की मर्यादा का। निश्चित तौर पर ऐसे लोगों के लिए धर्म अच्छे आचरणों को धारण करने या ईश्वर तक पहुंचने का तत्व या साधन तो कतई नहीं है बल्कि वह नफरत के कारोबार का एक सहायक तत्व ही है।

इसके अलावा हम देश के मध्यवर्गीय युवाओं को यह समझाने में नाकाम भी रहे हैं कि हमारे लोकतंत्र में कानून का राज है। किसी नेता, पार्टी या मजहब का नहीं। संभव है कि तन्वी सेठ और विकास मिश्र के बीच हुई बातचीत की हकीकत प्रस्तुत हकीकत से अलग हो और विकास मिश्र वैसे दोषी न हों जैसे नज़र आए।

इसके बावजूद इस घटना को साम्प्रदायिक रंग देने से किसी का फायदा नहीं है और नुकसान पूरे देश और मानव समाज का है। अगर भारत को लंबे समय तक एक लोकतंत्र के रूप में रहना है तो अंतरधार्मिक और अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहित करना होगा और अगर उनमें अड़चन डालने वाले कानूनी और धार्मिक प्रावधानों को हटाना हो तो संकोच नहीं करना चाहिए।