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भास्कर संपादकीय: विकास के सुनहरे आंकड़ों के बीच धुंधली तस्वीर

विकास का जो भी आंकड़ा बढ़ रहा है उसके पीछे प्रशासन, रक्षा और दूसरी सेवाओं के खर्च का योगदान है।

Dainik Bhaskar

Jun 01, 2018, 10:10 PM IST
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गुरुवार को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी जीडीपी के आंकड़े विकास के एक पक्ष की चमकदार झलक प्रस्तुत करते हैं लेकिन, जब उसे लेकर पूरी तस्वीर बनाई जाती है तो उसमें कई किस्म के अंधेरे नज़र आते हैं। सही है कि रबी की अच्छी फसल, मैन्यूफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में आई तेजी के कारण 2017-18 की जनवरी और मार्च की चौथी तिमाही में जीडीपी की विकास दर 7.7 प्रतिशत तक आंकी गई है। यह वृद्धि इसलिए भी ज्यादा लग रही है, क्योंकि पिछले साल इसी तिमाही में यह दर 6.1 प्रतिशत थी। इसी तरह सकल मूल्य संवर्धन(जीवीए) 6.5 प्रतिशत होने का अनुमान है, जो कि पहले के अनुमान के मुताबिक 0.1 प्रतिशत ज्यादा है लेकिन, पिछले वित्त वर्ष के 7.1 के मुकाबले काफी कम है। दरअसल, विकास दर की जो भी खुशी हासिल हो रही है वह पहले के निम्न आधार के नाते है।

इसके बावजूद इन आंकड़ों से वित्त मंत्रालय के मौजूदा प्रभारी मंत्री पीयूष गोयल के इस आशावाद पर अविश्वास नहीं करना चाहिए कि अर्थव्यवस्था सही रास्ते पर है। वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में 5.6 प्रतिशत, दूसरी में 6.3, तीसरी में 7.0 और चौथी में 7.7 का आंकड़ा निश्चित तौर पर एक सुनहरी तस्वीर प्रस्तुत करता है। इससे अलग जब इस बात पर नज़र जाती है कि इस बीते वित्त वर्ष की कुल जीडीपी वृद्धि दर 6.7 ही है तो तस्वीर का स्याह पक्ष उजागर होता है। स्थायी कीमतों पर गैर-कृषि निजी क्षेत्र की चौथी तिमाही की विकास दर तीसरी तिमाही के 8.1 प्रतिशत के मुकाबले गिरकर 7.3 पर है। व्यापार, होटल, परिवहन,संचार, वित्त, जायदाद, प्रोफेशनल सेवाएं सभी में चौथी तिमाही में कम वृद्धि दर्ज की गई है। विकास का जो भी आंकड़ा बढ़ रहा है उसके पीछे प्रशासन, रक्षा और दूसरी सेवाओं के खर्च का योगदान है।

विकास की यह तस्वीर उस समय और जटिल हो जाती है जब कच्चे तेल के बढ़ते दामों पर नज़र डाली जाती है, जिसके नाते मूडीज ने भारत के विकास का अनुमान घटाया है। इस स्थिति ने जहां आयात को महंगा कर दिया है तो निर्यात की वृद्धि को प्रभावित किया है। स्थिति खेती के लिए अच्छी नहीं है, क्योंकि नोटबंदी से खेती में आई मंदी का असर जारी है और रबी के जबरदस्त उत्पादन ने उसे घटाने की बजाय बढ़ाया ही है जो किसानों की नाराजगी के तौर पर दिख रहा है। कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था की अच्छी स्थिति के बीच जनता की स्थिति गड़बड़ है।

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