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संपादकीय: अनुसूचित जाति उत्पीड़न कानून के विरोध में सवर्णों का गुस्सा

Dainik Bhaskar

Sep 06, 2018, 12:12 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कानून का दुरुपयोग को रोकने के लिए फैसला दिया था- मुकदमा दायर होते ही किसी को गिरफ्तार न किया जाए

Bhaskar editorial under scst act essue

गुरुवार को 35 सवर्ण संगठनों की ओर से अनुसूचित जाति और जनजाति उत्पीड़न अधिनियम में संसद की ओर से किए गए संशोधन के विरुद्ध आहूत भारत बंद का सबसे ज्यादा शोर मध्य प्रदेश में सुनाई दे रहा है, जो उचित ही है, क्योंकि वहां चुनाव है और चुनाव ही वह मौका होता है, जब विभिन्न वर्ग अपने मुद्‌दे रखते हैं। छत्तीसगढ़ में भी संशोधन के खिलाफ प्रतिक्रिया इसी वजह से दिखी है। सुप्रीम कोर्ट से कानून को नरम बनाए जाने के विरोध में जब 2 अप्रैल को दलित संगठनों ने बंद का आयोजन किया था तो सबसे ज्यादा हिंसा ग्वालियर संभाग में ही हुई थी। इसीलिए इस बार भिंड में तो निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है और मध्य प्रदेश के कई जिलों में एहतियाती चौकसी बरती जा रही है।

इस भारत बंद का आयोजन करने वाले संगठनों में ब्रह्म समागम समाज, क्षत्रिय महासभा, जन कल्याण संगठन और करणी सेना समेत 35 संगठन शामिल हैं। इस मामले पर समाज में विभाजन है इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर भारतीय समाज की यह एक सच्चाई है कि अभी भी अजा-अजजा पर समाज की संपन्न और दबंग जातियों की ओर से अत्याचार होते हैं तो उसी के साथ यह भी यथार्थ है कि अजा और अजजा उत्पीड़न निरोधक अधिनियम का दुरुपयोग भी होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी दुरुपयोग को रोकने के लिए ही फैसला दिया था कि मुकदमा दायर होते ही किसी को गिरफ्तार न किया जाए और कम से कम सात दिन तक उस मामले की तहकीकात की जाए। घटना सही पाए जाने पर ही मामला दर्ज हो। उसके विरोध में दलित संगठनों ने 2 अप्रैल को जबरदस्त बंद किया, जिसमें हिंसा भी हुई।

उधर एनडीए में शामिल दलित नेताओं ने प्रधानमंत्री से मिलकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने वाला कानून पास करने का दबाव बनाया। सरकार दबाव में आ गई और उसने कानून पारित कर दिया। बल्कि सरकार ने संसद के मानसून सत्र को सामाजिक न्याय का सत्र भी कहकर संबोधित किया, क्योंकि इस दौरान पिछड़ा वर्ग आयोग बना और फिर यह कानून पारित हुआ। सवर्ण समाज का एक हिस्सा इस कानून को तुष्टीकरण वाला कानून मान रहा है और इसे शाहबानो के मामले जैसा ही देख रहा है। अब भाजपा के समक्ष चुनौती है कि चुनाव के मौसम में वह कैसे दलितों और सवर्णों को एक साथ खुश करे और सामाजिक सौहार्द और न्याय को कायम रखे।

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